मिर्जापुर
के कार्यक्रम के बाद नीरज जी से मेरी टेलीफोन पर बातचीत होने लगी थी।शायद
३जनवरी १९९९ को ( तारीख गलत हो तो सर्वेश अास्थाना ठीक करें ...)लखनऊ में नीरज जी की हीरक जयंती
(७५वीं )मनायी जानी थी ।नीरज जी ने मुझसे टेलीफोन पर कहा कि मैंने तुम्हारे
लिए सर्वेश से बोल दिया है।तुम उस दिन समय से आ जाना।उस तारीख से एक दिन पहले
चुनार के आसपास कोई कवि सम्मेलन था जिसमें पूर्वांचल के कई कवि थे।श्रीकृष्ण तिवारी भी थे,जिन्हें लखनऊ नीरज जी के इस
अभिनंदन में जाना था पर मुझे उनकी बातचीत से लग गया कि उन्हें अधिक धनराशि वाला
कोई अन्य कार्यक्रम मिल गया है , इसलिए वे वहाँ नहीं जा रहे हैं।मंच
पर जाने वालों लोगों के लिए यह सामान्य बात है ।मैं उस दिन सुबह बनारसी कवियों
के साथ साथ बनारस पहुँचा और वहाँ से ट्रेन पकड़कर शाम को ५ बजे के आसपास लखनऊ
पहुँचा।रवींद्रालय ( जहाँ कार्यक्रम रखा गया था) लखनऊ रेलवे स्टेशन के बिल्कुल
पास है।नीरज
जी को सम्मानित करने तब मुलायम सिंह यादव पधारे थे।किसी कवि के साहस का नमूना
मुझे उस दिन पहली बार देखने को मिला था।उस कवि ने (मैं नाम भूल रहा हूँ)मुलायम
सिंह को बार बार संबोधित करते हुए एक लंबी कविता पढ़ी थी जिसमें प्रतीकात्मक
रूप से उनकी कमियाँ गिनाई थीं ।एक पंक्ति कुछ यूँ थी -
पहले
तो थोड़ा ही जल मटमैला था ,
तुमने
पूरी नदी विषैली कर डाली !
उस
कवि का बाद में क्या हुआ ,मुझे पता नहीं !लेकिन ऐसी ही कविता सुनाने पर एक समय में मुलायम सिंह
यादव ने वीर रस के कवि नरेश कात्यायन को बर्खास्त करा दिया था।कविवर ने बहुत
कोर्ट कचहरी का चक्कर लगाया तो दुबारा बहाल हुए।
कृष्ण
बिहारी नूर को मैंने वहाँ दूसरी बार सुना।डॉ.सुरेश ,शिवओम अंबर ,मुकुल महान ,प्रमोद तिवारी समेत दस कवि रहे
होंगे।बहुत शानदार कवि सम्मेलन हुआ।रात में रुकने की ब्यवस्था सरकारी गेस्ट
हाउस में थी।दूसरे दिन सुबह उठकर जब मैं नीरज जी के कमरे में गया तो देखा कि
कुछ स्थानीय पत्रकार उनसे बातें कर रहे हैं।नीरज जी जिस कवि सम्मेलन में भी
जाते थे उनके इंटरव्यू के लिए आए कुछ पत्रकारों को मैंने हर बार देखा।ऐसा मंच
के किसी अन्य कवि के साथ होते नहीं देखा।फिल्मों से मिली अपार लोकप्रियता और
उनके प्रति जनता की दीवानगी की यह एक मिसाल थी।दूसरे दिन अमेठी में डॉ़. सुरेश
ने उनके सम्मान में कवि सम्मेलन रखा था।नीरज जी मुझे वहाँ भी ले गए।यह
कार्यक्रम भी खूब जमा।डॉ.सुरेश के गीतों को भी खूब सराहा गया।नीरज जी को
उन्हीं के बाद पढ़ना था।मुस्कुराते हुए बोले - मैं तो नर्वस हो रहा हूँ,तुमने इतने अच्छे अच्छे गीत सुना
दिए …..!
कुछ
दिनों बाद नीरज जी रावर्ट्सगंज मधुरिमा संस्था के कार्यक्रम में पधारे।उस कवि
सम्मेलन में मैं भी आमंत्रित था।नीरज जी ने अपनी प्रसिद्ध ग़ज़ल सुनायी -
खुशबू
सी आ रही है इधर जाफरान की,
खिड़की
खुली हुई है उनके मकान की।
चकाचक
बनारसी ने उसकी पैरोडी सुनायी-
बदबू
सी आ रही है इधर नाबदान की
नीरज
को महक लग रही है जाफरान की।
भीड़
को तो आनंद से मतलब है।क्या सम्मान,क्या अपमान ….क्या गीत ग़ज़ल,क्या पैरोडी .........…!.सर्वविदित है कि नीरज से अधिक पैसे
सुरेंद्र शर्मा और उनसे भी बहुत अधिक जूनियर लोग लेते रहे हैं।जाने क्यों नीरज
जी ने अपना पेमेंट बहुत अधिक नहीं किया।अपने दौर के सफलतम कवि नीरज को नयी सदी
में कई सारे मंचों पर बहुत कम सुना भी गया।श्रोताओं के ठंडे उत्साह की वजह से
नीरज स्वयं भी कहीं कहीं दस पंद्रह मिनट में ही कविता सुनाकर बैठ गये।
१९९९
के जून महीने से मैं मुंबई रहने लगा था।अगस्त में मैंने एक दिन यहाँ से उनके
घर अलीगढ़ फोन किया तो पता चला कि नीरज जी देव आनंद की फिल्म सेंसर के लिए गीत
लिखने मुंबई आए हुए हैं।मैंने देव आनंद के ऑफिस में फोन किया तो पता चला कि वे
बांद्रा के लकी होटल में रुके हैं।मैंने लकी होटल में फोन किया तो उन्होंने
अगले दिन मिलने के लिए कहा।अगले दिन मैं उनके पास पहुँचा ….उस समय कारगिल युद्ध चल रहा
था।नीरज जी ने कहा - तुमने आज का अखबार देखा .........पाकिस्तान ने युद्ध में मारे
गए अपने सैनिकों को पहचानने से इनकार कर दिया तो भारत के सैनिकों ने उन्हें
दफन किया।फिर देर तक विभिन्न विषयों पर बातें होती रहीं।उन्होंने पूछा -सिर्फ
घूमने आए हो या रहने के लिए।मैंने कहा - यहीं रहने का इरादा है।वे बोले -
मुंबई में कला की सबसे ज्यादे इज्जत है।जो यहाँ ठान के आते हैं,वही रहते हैं।जो सिर्फ ट्राई करने
के लिए आते हैं,वापस
चले जाते हैं।फिर बोले- चलो कल देव आनंद से मिलवाता हूँ।
अगले
दिन अपने साथ वे मुझे देव आनंद के पाली हिल स्थित बँगले पर ले गए।उन्होंने कहा
- जाते ही पाँव छूना और चाय पीकर निकल लेना।अपनी तरफ के लोगों का मामला “हजरते दाग जहाँ बैठ गए,बैठ गए .”..जैसा होता है।
देव
साहब शर्ट को गले तक आखरी बटन बंद किए हुए अपनी खास टोपी लगाये बैठे हुए
थे।मैंने पाँव छुये तो बोले - बैठिए बैठिए …वेलकम।नीरज जी ने मेरा परिचय दिया
।देव साहब मुझसे मेरी पढ़ाई लिखाई और मुंबई आने के बारे में बातें करने
लगे।चाय पीने के बाद मैं निकलने लगा तो बोले - क्यों साहब इतना जल्दी क्यों चल
दिए.... कुछ माइंड तो नहीं किए?मैंने कहा - नहीं।वे बोले - कल
अंपायर स्टूडियो में हमारे गाने की रिकार्डिंग में आइए।नीरज जी के गीत
सुनिए।मैंने कहा - जरूर।दूसरे दिन मैं वीरा देसाई स्थित अंपायर स्टूडियो दोपहर
के वक्त पहुँचा।(यह स्टूडियो यूसुफ लकड़ावाला का है जो सुनील दत्त से लेकर आज
के युवा फिल्मकार इम्तियाज अली तक को फिल्म निर्माण में फाइनेंस करते रहे हैं।बहुत
बाद में उनसे देवमणि पाण्डेय के साथ एक बार मिलने का संयोग बना।) फिल्म सेंसर
के संगीतकार जतिन ललित उस समय वायलिन रिकॉर्ड कर रहे थे।करीब तीस पैंतीस
वायलिन प्लेयर एक साथ वायलिन बजा रहे थे।अब तो वह दौर ही चला गया,लोग मैक्सिमम काम कंप्यूटर
जेनरेटेड म्यूजिक से ले रहे हैं।
नीरज
जी ने मेरे लिए तब मुंबई में दो लोगों को खासतौर पर फोन किया - शैल चतुर्वेदी
और आसकरन अटल ।शैल जी तब बीमारी के कारण उतने सक्रिय नहीं रह गए थे।आसकरन अटल ने मुझे कई
जगह इंट्रोड्यूस किया और अब भी उनसे मेरा स्नेह संबंध बना हुआ है।

उस
मुलाकात के बाद मुंबई में नीरज जी से कई और मुलाकातें हुईं।एक बार मुंबई
के चीरा बाजार स्थित शारदा होटल में मैं उनसे मिलने पहुँचा।दोपहर का वक्त
था।नीरज जी के साथ गोविंद व्यास और प्रदीप चौबे बैठे थे ।ये लोग ताश खेलने के मूड
में थे।नीरज जी ने मुझसे कहा - आओ तुम भी बैठ जाओ।मैंने कहा - मैं तो ताश
खेलना नहीं जानता ….तो
बैठे रहो- उन्होंने कहा।उस दिन मुझे उनके साथ ताश न खेल पाने का बहुत अफसोस
हुआ।भिन्न भिन्न मुलाकातों में मैंने उनसे कई इंटरव्यू किए जो कई पत्र
पत्रिकाओं और मेरी साक्षात्कार पुस्तक चेहरे में प्रकाशित हैं।एक बार औपचारिक
बातचीत में उन्होंने
कहा - मेरा आधा जीवन लड़कियों के पत्रों का उत्तर देने और ट्रेनों से यात्रा
करने में चला गया,वर्ना
और अधिक काम
कर पाता!
मैंने
मुंबई से जब अनुष्का पत्रिका का प्रकाशन प्रारंभ किया तो उन्होंने रचनाएँ
भेजी।उनसे आखरी मुलाकात दो साल पहले तब हुई थी जब वे सब टीवी के ‘वाह वाह क्या बात है ‘ कार्यक्रम की शूटिंग के लिए आए
थे।मैं और लखनऊ की सुख्यात कवयित्री लता श्री उनसे मिलने गए थे।औपचारिक बातचीत
के बाद उन्होंने मुझसे मुंबई के वरिष्ठ कवि लोचन सक्सेना के बारे में पूछा -
उसे क्या हुआ था ,कैसे
मरा? मैंने
बताया जो मुझे पता था …..लोचन
हमारे बहुत करीबी दोस्त थे।उनकी यादों को दुहराकर दुबारा उस पीड़ा से गुजरना
नहीं चाहता।बाइस तेइस साल की उम्र में जब साहित्य की दुनिया में सक्रिय हुआ तो पचास.. साठ ...सत्तर साल के लोगों से परिचय और दोस्ती
शुरू हुई।अब अक्सर उनमें से किसी के मृत्यु की सूचना मिलती है,मन अवसाद से भर जाता है।उनके बारे
में लिखते हुए दुहरी पीड़ा झेलनी होती है।
|