Wednesday, 6 March 2024

अक्षय तृतीया से जुड़ी कथायें

 अक्षय तृतीया से जुड़ी कथायें


रासबिहारी पाण्डेय


वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य और चंद्रमा इस दिन उच्च फलदायक राशि में रहते हैं।इस तिथि से इतने पौराणिक संयोग जुटे हैं कि इसे स्वयं सिद्ध मुहूर्त मान लिया गया है, इसीलिए इस दिन लोग जीवन के विविध मांगलिक कार्यों का शुभारंभ करते हैं।विवाह, गृह प्रवेश,उपनयन संस्कार, सोने चांदी के आभूषण एवं वाहनों की खरीद तथा नए व्यापार की शुरुआत के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन दान पुण्य का भी विशेष महत्व है। इस दिन को किए गए पुण्य कर्म व्यक्ति को अगले जन्म में कई गुना अधिक होकर मिलते हैं।यही नहीं यदि इस दिन कोई बुरा कार्य किया जाता है तो उसका भी कई गुना अधिक बुरा फल मिलता है और उसे नर्क में जाकर भोगना पड़ता है।

अक्षय शब्द का अर्थ होता है- न समाप्त होने वाला अर्थात् जिस तिथि में किए गए पुण्य कर्मों का फल कभी समाप्त न हो।अक्षय तृतीया उसी तिथि का नाम है। इस तिथि से कई कथाएं जुड़ी हुई हैं। आज ही के दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी की जयंती मनाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार आज ही महर्षि वेदव्यास ने  महाभारत लिखना प्रारंभ किया और लेखन सहायक के रूप में मंगलमूर्ति गणेश को साथ रखा। इसी दिन द्रौपदी को अक्षय पात्र की प्राप्ति हुई थी। पांडवों के वनवास की अवधि में द्रोपदी को मिले इस पात्र की विशेषता यह थी कि जब तक द्रौपदी स्वयं नहीं खा लेती थी, इस पात्र से कितने भी लोगों को खिलाया जा सकता था। निर्धन सुदामा का द्वारकाधीश कृष्ण से मिलने और कृष्ण द्वारा दो लोकों की संपत्ति देने की कथा भी इसी तिथि से जुड़ी है।बंगाल में इस दिन व्यापारी अपने नए बही खाते की शुरुआत करते हैं।पंजाब के किसान इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में खेतों पर जाते हैं और रास्ते में मिलने वाले पशु पक्षियों के मिलने पर आगामी मौसम को शुभ शगुन मानते हैं।   वैशाख मास में शुक्ल पक्ष की तृतीया तिथि को अक्षय तृतीया के रूप में मनाया जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य और चंद्रमा इस दिन उच्च फलदायक राशि में रहते हैं।इस तिथि से इतने पौराणिक संयोग जुटे हैं कि इसे स्वयं सिद्ध मुहूर्त मान लिया गया है, इसीलिए इस दिन लोग जीवन के विविध मांगलिक कार्यों का शुभारंभ करते हैं।विवाह, गृह प्रवेश,उपनयन संस्कार, सोने चांदी के आभूषण एवं वाहनों की खरीद तथा नए व्यापार की शुरुआत के लिए यह दिन अत्यंत शुभ माना गया है। इस दिन दान पुण्य का भी विशेष महत्व है। इस दिन को किए गए पुण्य कर्म व्यक्ति को अगले जन्म में कई गुना अधिक होकर मिलते हैं।यही नहीं यदि इस दिन कोई बुरा कार्य किया जाता है तो उसका भी कई गुना अधिक बुरा फल मिलता है और उसे नर्क में जाकर भोगना पड़ता है।

अक्षय शब्द का अर्थ होता है- न समाप्त होने वाला अर्थात् जिस तिथि में किए गए पुण्य कर्मों का फल कभी समाप्त न हो।अक्षय तृतीया उसी तिथि का नाम है। इस तिथि से कई कथाएं जुड़ी हुई हैं। आज ही के दिन भगवान विष्णु के छठे अवतार परशुराम जी की जयंती मनाई जाती है। शास्त्रों के अनुसार आज ही महर्षि वेदव्यास ने  महाभारत लिखना प्रारंभ किया और लेखन सहायक के रूप में मंगलमूर्ति गणेश को साथ रखा। इसी दिन द्रौपदी को अक्षय पात्र की प्राप्ति हुई थी। पांडवों के वनवास की अवधि में द्रोपदी को मिले इस पात्र की विशेषता यह थी कि जब तक द्रौपदी स्वयं नहीं खा लेती थी, इस पात्र से कितने भी लोगों को खिलाया जा सकता था। निर्धन सुदामा का द्वारकाधीश कृष्ण से मिलने और कृष्ण द्वारा दो लोकों की संपत्ति देने की कथा भी इसी तिथि से जुड़ी है।बंगाल में इस दिन व्यापारी अपने नए बही खाते की शुरुआत करते हैं।पंजाब के किसान इस दिन ब्रह्म मुहूर्त में खेतों पर जाते हैं और रास्ते में मिलने वाले पशु पक्षियों के मिलने पर आगामी मौसम को शुभ शगुन मानते हैं। इस दिन उड़ीसा के जगन्नाथपुरी में रथयात्रा भी निकाली जाती है। जैन धर्मावलंबी इस तिथि को अपने चौबीस तीर्थंकरों में से एक ऋषभदेव से जोड़कर देखते हैं। ऋषभदेव ने सांसारिक मोह माया त्याग कर अपने पुत्रों के बीच अपनी सारी संपत्ति बांट दी और संन्यस्त हो गए। बाद में वे सिद्ध संत आदिनाथ के रूप में जाने गए। इस दिन भगवान विष्णु और महालक्ष्मी की विशेष पूजा अर्चना की जाती है ,आज पूजन में उन्हें चावल चढ़ाने का विशेष महत्व है। अक्षय तृतीया को विवाह के लिए सबसे शुभ मुहूर्त माना जाता है। इस दिन हुए विवाहों में स्त्री पुरुष में प्रेम बना रहता है और संबंध विच्छेद/ तलाक आदि की स्थिति नहीं बनती। इसी दिन से त्रेता युग की शुरुआत भी मानी जाती है।

अष्टादश पुराणेषु व्यासस्य वचनं द्वयं।

परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनं।

अठारह पुराणों में महर्षि वेदव्यास ने निकष के रूप में दो ही बातें कही हैं- किसी पर उपकार करने से पुण्य मिलता है और किसी को कष्ट देने से पाप मिलता है।गोस्वामी तुलसीदास ने रामचरितमानस में यही बात कही है- 

परहित सरिस धर्म नहिं भाई।

परपीड़ा सम नहिं अधमाई।।

हमारे सभी पर्व त्यौहारों में प्रकारांतर से परोपकार और परहित की बात ही कही गई है।मनुष्य जीवन की सार्थकता इसी में है कि हम देश और समाज के  काम आ सकें।सिर्फ अपने लिए जिया तो क्या जिया!