साक्षात्कार
राजनीति के पांव जब-जब लड़खड़ाएंगे,साहित्य ही उन्हें सहारा
देगा- सोम ठाकुर
(सोम ठाकुर से अरविंद शर्मा राही की बातचीत)
मुक्तक, ब्रजभाषा के छन्द और बेमिसाल लोकगीतों के वरिष्ठ एवम्
लोकप्रिय रचनाकार तिरासी वर्षीय गीतऋषि श्री| सोम ठाकुर जी पिछले ६५ वर्षो से अनवरत अपने रचनाकर्म से
हिन्दी गीत विधा की श्रीवॄद्धि और काव्यमंचो पर गीतों की प्रतिष्ठा का जो पुनीत
कार्य कर रहे हैं वह अपने आप में अतुलनीय है | अपने उत्कॄष्ट लेखन के साथ साथ सुमधुर कण्ठ और मंत्रमुग्ध
कर देने वाली प्रस्तुति से पाठकों और श्रोताओं के दिलों पर राज करने वाले यशस्वी
गीतकार सोम ठाकुर के देश विदेश में लाखो प्रसंशक मौजूद हैं| उत्तर प्रदेश
हिन्दी संस्थान के कार्यकारी अध्यक्ष रह चुके सोम ठाकुर जी को ‘यश भारती’ , महीयसी महादेवी
वर्मा पुरस्कार,ब्रजभाषा सेवा सम्मान समेत अनेको राष्ट्रीय व अन्तराष्ट्रीय
सम्मानों से नवाजा जा चुका है| पिछले दिनों मुम्बर्इ की सुप्रसिद्ध साहित्यिक संस्था श्रुति
संवाद साहित्य कला अकादमी की ओर से सोम ठाकुर जी को लब्ध प्रतिष्ठित सम्मान राजीव
सारस्वत सम्मान२०१५ प्रदान किया गया| इस अवसर पर अनुष्का पत्रिका के लिये अरविन्द राही द्वारा
सोम ठाकुर से की गयी बातचीत के प्रमुख अंश :
अरविन्द राही - सर्व प्रथम तो
आपको राजीव सारस्वत सम्मान २०१५ से
सम्मानित किये जाने पर हमारी बधार्इ| आपने एक लम्बा
कालखण्ड हिन्दी साहित्य की सेवा में गुजारा है और यह यात्रा आज भी अनवरत रूप से
जारी है| विशेषकर हिन्दी
गीतों के संवर्धन का जो कार्य आप करते आ रहे हैं| उसके लिये प्रशंसा के शब्द कम पड़ जाते हैं| हिन्दी कविसम्मेलन के मंचो पर आप लगभग ६ – ७ दशक से लगातार
अपनी दमदार उपस्थिति बनाये हुए हैं| हम आपसे जानना चाहेंगे कि इस यात्रा की शुरूवात कैसे और कब
हुर्इ
सोम ठाकुर : राही जी मै आपको
बातलँ कि मैं तो विज्ञान का विदयार्थी था| साहित्य से मेरा कोर्इ सम्बन्ध न था| हुआ यूँ कि सन्
१९५० में मैं आगरा कालेज में इंटर साइंस का विदयार्थी था| एक मेरे सहपाठी हुआ करते थे| उन्ही के आग्रह
पर आगरा मे आयोजित एक कविसम्मेलन में बतौर श्रोता मैं पहली बार गया| इसमें रंग जी, वीरेन्द्र मिश्र
आदि कवि पधारे थे| उसमें वीरेन्द्र
मिश्र का गीत दूर होती जा रही है कल्पना, पास आती जा रही है जिन्दगी और रंग जी का गीत तुम्हारी शपथ
मै तुम्हारा नही हूँ,भटकती लहर हूं किनारा नहीं हूं समेत तमाम कवियों की रचनायें
सुनीं| ये रचनायें मेरे
दिलो – दिमाग पर गहरे तक
छा गयीं| दूसरे दिन इन
कवियों की किताब ढूढ,ने मैं लायब्रेरी
जा पहु्च, वहाँ इनकी
किताबें तो न मिली परन्तु मेरे हाथ महादेवी वर्मा जी की कॄति दीप शिखा हाथ लग गयी
जिसे पढने समझने को लिये मुझे शब्दकोश खरीदना पड़ा| इस प्रकार ये पहली साहित्यिक कॄति थी जिसे मैनें पढा |
अरविन्द राही : दादा, आपके लेखन की
शुरूवात कैसे हुर्इ ?
सोम ठाकुर : जैसा कि मैने
बताया वीरेन्द्र मिश्र आदि को सुनने और पढ,ने के उपरान्त मुझे लगा कि यदि मै भी प्रयास करूँ तो अपने
भावों का कुछ कुछ इसी रूप में व्यक्त कर सकता हूँ और मैंनै अपना पहला गीत लिखा -यातनायें
ये नहीं, निर्माण के पल
हैं| गीत मित्रों को सुनाया
तो बहुत सराहना मिली हालांकि कुछ मित्रों ने ये भी कहा कि किसी से लिखवा लिया होगा| मित्रों की
सराहना से उत्साह बढा और मै चल पड़ा|
अरविन्द राही :अच्छा ये बतायें कि आपका नाम सोम ठाकुर कैसे
पड़ा, बचपन से ही था या
बाद में पड़ा ?
सोम ठाकुर : इस नाम के पीछे
भी एक कहानी है| मै अपने माता
पिता की सातवीं संतान हूँ|
मुझसे पहले मेरे
पिताजी की पहली पत्नी से पाँच सन्तानें हुर्इं जो कि सब बचपन में ही काल कवलित हो
गयीं| दूसरी से एक बहन
हुर्इ वो भी मॄत ,फिर मेरा जन्म हुआ| एक नागपंथी संत ने मेरी दादी से भविष्यवाणी कर रखी थी कि
मेरा जन्म सोमवार को होगा जो सच साबित हुर्इ और मेरा नाम सोम नारायण सिंह रखा गया| वैसे राशि के
अनुसार मेरा नाम निरंजन सिंह रखा गया था| बाद में मंचो पर प्रतिष्ठित होने के पश्चात प्रसिद्ध कवि
गीतकार प्रो. जगत प्रकाश
चतुर्वेदी के कहने पर मैने अपना नाम संक्षिप्त कर सोम ठाकुर कर लिया, जो आज तक है|
अरविन्द राही - आपका काव्य मंचों
पर पदार्पण कब हुआ ?
सोम ठाकुर : सन् १९५१ में
आगरा कॉलेज में एक कविसम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसमें बाहर के तमाम बडे कवि आमंत्रित थे और कुछ स्थानीय भी| मित्रों ने मेरा
नाम भी दे दिया| सबसे पहले मुझे
ही पढने के लिये खडा कर दिया गया| कविता तो जो थी
सो थी ही लेकिन मेरा कण्ठ सुमधुर होने के कारण मुझे भरपूर सराहना मिली और वंस मोर
के नारे भी लगे | मैने बड़ी
साफगोर्इ से कहा कि मेरे पास एक ही कविता है और मैं अपने स्थान पर बैठ गया| ये मेरे जीवन का
पहला मंच था| फिर मैने दुसरा
गीत लिखा : चाँद युग – युग से चमकता ही
रहा, किन्तु बन्धन से
न छूटी चाँदनी एक और गीत लिखा - झिलमिलाते गीत अम्बर ने सजाये, फिर तो ये लिखने
पढने का सिलसिला ही
चल पड़ा| ये गति मैंने तब
लिखे थे जब मैं सांइस का विदयार्थी था| इसी बीच गीत मैग्जीन
में प्रकाशित हो गये| हमारे फिजिक्स के
एक प्रोफेसर थे नीलाम्बर श्रीवास्तव उन्होंने यह कविता मैग्जीन में पढी और क्लास में
आकर अत्यन्त प्रशंसा की| और लोगों को भी
पता चला| कुछ को तो बड़ा
आश्चर्य हुआ कि सोम कविता लिखता है .खैर, कवि के रूप में ख्याति प्राप्त होने लगी| स्थानीय मंचों पर
जाने लगा| उस समय कुर्ता
पायजमा पहनकर मंचों पर जाना अच्छा लगता था| उन दिनों मैंने अपना उपानाम अम्बुज रख लिया था, हलाँकि ये नाम
बहुत कम समय मेरे साथ रहा|
मुझे १९५३ में
पहली बार आगरा से बाहर कवि सम्मेलन में जाने का अवसर मिला| ये था पं. गोपाल प्रसाद व्यास
के संचालन में हाथरस का कवि सम्मेलन वहाँ दो गीत पढ़े ,लोगों की प्रसंशा
मिली, कुछ रूपये, पत्र पुष्प, सम्मान आदि मिला| जोड़ -घटाव किया तो मन ने कहा कि आय भी है, सम्मान भी और
साहित्य साधना भी, बस इसी में रम
गया|
अरविन्द राही : आपको गीतों का राजकुमार कहा जाता है| आपकी सुन्दर
देहयष्टि, सुमधुर कण्ठ, सशक्त लेखन और प्रभावी प्रस्तुति से लोग मंत्रमुग्ध
हो जाते हैं| परन्तु हमने सुना
है कि कालेज के दिनों में आपके कर्इ गीत प्रतिबंधित कर दिये गये थे, इसमे कितनी
सच्चार्इ है ?
सोम ठाकुर : (हँसते हुए) अरे नहीं भार्इ, कर्इ गीत नहीं बस एक ही गीत था| बात दरअसल ये थी
कि कालेज में पढ़ने के दौरान ही मुझे कविसम्मेलनों में और मित्रों के बीच अच्छी
सराहना मिलने लगी थी| उस दौर में मेरे
कर्इ गीत लोगों की जुबान पर चढ़े थे| ऐसे में मैने एक गीत लिखा- मिलना है तो जीवन भर को मिल, पलभर की बात नही
मानूँगा , अपनाना है तो मन से अपना, भाँवर की बात नहीं मानूंगा| ये गीत काँलेज के
सहपाठियों के बीच अपार लोकप्रिय हुआ| फिर तो आलम ये हुआ कि इस गीत के मुखड़े पढकर लड़कियों पर
फब्तियाँ कसी जाने लगीं, लड़के क्लास रूम में
ब्लैकबोर्ड पर तो कभी पानी पीने की जगह पर आदि तमाम सार्वजनिक जगहों पर इस गीतों
को लिख देते | इस बात की चर्चा
इतनी बढी कि बात प्रिंसिपल तक पहुँच गयी| उन्होंने मुझे बुलाया पूछा -ये गीत तुमने लिखा है| मैंने कहा हाँ| तो वे बोले कि आज
के बाद तुम ये गीत नही पढोगे ,वरना मैं तुम्हे कॉलेज से रिस्टीकेट कर दूगाँ|
अरविन्द राही : आज इतना लम्बा सफर तय करने के उपरान्त यदि
अतीत में झाँके तो कौन – कौन से
महत्वपूर्ण पड़ाव आपको याद आते है ?
सोम ठाकुर : राही जी
महत्वपूर्ण तो जीवन का प्रत्येक पल होता है| हर पड़ाव अगले सफर की भूमिका होता है| फिर भी भगवतीचरण
वर्मा के आमंत्रण पर २१ जून १९५५ को आ्रल इंडिया रेडियो दिल्ली से पहली बार मेरी रचनाओं का प्रसारण हो
या १९५७ में लाल किले का कविसम्मेलन जिसका उद्घाटन पं.जवाहरलाल नेहरू
ने किया था और जिसमे ४४ कवियों में मैं एकमात्र ऐसा कवि था जिसने दो गीत पढे थे, ये सब बहुत याद
आते है| मैथिलीशरण गुप्त, सुमित्रानन्दन पन्त, सोहनलाल द्विवेदी, रमर्इ काका, दिनकर जी, श्यामनारायण
पाण्डेय, महादेवी वर्मा, नीरज जी, हरिवंश राय बच्चन
आदि तमाम शीर्षस्थ रचनाकारों का सानिध्य जीवन की अमूल्य निधि है| मुझे याद आता है
कि चलचित्र जगत के सदी के महानायक अमिताभ बच्चन अपने बचपन में एक बार मेरा ऑटोग्राफ
ले रहे थे तो हरिवंश राय बच्चन ने मुझसे हँसते हुए कहा कि मेरा बेटा तुम्हारा ऑटोग्राफ
ले रहा है, अरे उसे ये तो
बता दो कि मैं भी कवि हूँ,
मेरा भी ऑटोग्राफ
ले ले|
एक घटना और याद
आती है कि १९५७ के लालकिले के कविसम्मेलन के उद्घाटन हेतु नेहरू जी पधारे थे| मंच पर चढ़ने के
दौरान उनका पाँव थोड़ा लड़खड़ा गया तो उन्हे
दिनकर जी ने सहारा दिया था|
इस घटना पर ३०
वर्ष बाद मैंने एक टिप्पणी की थी कि राजनीति के पाँच जब – जब लड़खड़ायेंगे, साहित्य ही उन्हे
सहारा देंगा| मेरी इस टिप्पणी
को कुछ लोंगो ने दिनकर जी की टिप्पणी समझ लिया था पर वास्तव में ये टिप्पणी मेरी
की हुर्इ थी, जो आज भी कोड की
जाती है|
अरविन्द राही : दादा आपने
कविसम्मेलनों एवम् अन्य माध्यमों से जुड़कर हिन्दी गीतों के साथ एक लम्बी यात्रा की जो
आज भी जारी है| आपने स्वयं
उत्कॄष्ट गीत रचे साथ ही मंचो पर गुप्त जी, पंत जी, बच्चन जी, दिनकर, सोहनलाल द्विवेदीजी आदि तमाम लोगो को भी सुना| हम आपसे जानना
चाहेंगे कि तब और अब के गीतों में आप क्या परिवर्तन पाते है ? गीतों की वर्तमान ‘दशा दिशा’ पर आप क्या कहना चाहेंगे?
सोम ठाकुर : राही जी देखिये उस समय कविता का व्यवसायीकरण नही हुआ था| शुद्ध गीत, शुद्ध कवितायें
लिखी जाती थी और वही सुनी जाती थी| ‘अर्थ का भी विशेष
महत्व नहीं था| यहाँ तक कि बाहर
से आमंत्रित कवियों का मात्र किराया ही मिलता था वो भी आर्नापार्इ में जोड़ कर| १० रूपये १२ आने
है तो ११ रूपये नहीं मिलता था, १०रूपये १२ आने ही मिलता था| बहुत ज्यादा ध्यान पैसे पर नहीं रहता था| फिर धीरे धीरे अब
व्यवसायीकरण हो गया| व्यवसायीकरण में
फिर जो पैसे देने वाले लोग थे, उनकी चलने लगी, जिसकी वजह से कविता का पतन होता गया और अच्छी कविता मंचो से
विदा होती गयी, घटिया कविता
स्थापित हो गयी क्योंकि जनता तो कच्चा दूध है, जो आप सुनायेंगे सुनेगी| लेकिन इसके बावजूद कुछ लोग ऐसे हैं जैसे वीरेन्द्र मिश्र जी
हुए, रंगजी ,भारत भूषण
जी, नीरज जी ,जिन्होंने
कविता की रक्षा की|
अच्छा, नयी कविता वालों
ने बहुत विरोध किया गीतों का| लेकिन नयी कविता का विरोध इसलिये नहीं चल पाया कि उसे जनता
ने नकार दिया| मैग्जीन के अन्दर
तो विरोध हुआ, परन्तु सामान्य
जनता के बीच गीतों की प्रतिष्ठा बनी रही| बहुत गिनी – चुनी पत्रिकायें थी जिनमें गीत छपते थे जैसे धर्मयुग था, साप्ताहिक
हिन्दुस्तान था सरिता वगैरह आदि| बाकी पत्रिकाओं में कइयों ने गीत को नकार दिया| लेकिन गीत कभी
खत्म नहीं हुआ| संख्या भले कम हो
गयी हो परन्तु खत्म नही हुआ| आज भी अच्छे गीत लिखे जा रहे है|
अरविन्द राही : दादा इस बात से आप कितना इत्तेफाक रखते हैं
कि गीतों को समाप्त करने के लिये कर्इ कर्इ बार साजिशें भी रची गयी, गीतों के विरोध
में अघोषित तौर पर आन्दोलन तक चलाये गये|
सोम ठाकुर : राही जी पूरा – पूरा इत्तेफाक रखता हूँ| कर्इ तरह की
साजिशें रची गयीं| एक तों जैसा
मैंने कहा नयी कविता के लोगों द्वारा रची गयी| साथ ही कुछ ऐसे संयोजक पैदा हुए जिन्होंने गीत की अपेक्षा
बहुत ही छिछले स्तर के हास्य को तरजीह दी. मंचो पर उसे प्रश्रय दिया क्योंकि उस पर
तुरंत रिस्पांस मिलता था|
इस कारण मंचो पर
गीत की स्थिति कमजोर हुर्इ|
दूसरी ओर जैसा कि
मैंने पहले ही कहा पत्रिकाओं में अधिकांश ने गीतों के विरोध मे नयी कविता को बढावा दिया, कारण इनके
सम्पादक्र प्रकाशक समूह के मालिक कहीं न कहीं गीतों के प्रति अपने पूर्वाग्रह से
ग्रसित थे| धर्मपुयुग जैसी
पत्रिकायें गीतों के समर्थन में थी, उनकी संख्या कम थी और कर्इ बन्द भी हो गयीं|
राही जी, एक बात मै यहाँ
अवश्य कहना चाहूँगा कि गीतों के विरोध में कितने भी आन्दोलन चलाये गये, कितनी ही साजिशें
रची गयीं, गीत कभी खत्म नहीं हुए, उलटे और निखरकर और मुखर होकर सामने आये| गीत न कभी मरा था, न मरा है और न
मरेगा | गीतों मे ही वह
सामर्थ्य है जो न केवल कविसम्मेलन के मंचों को अपितु साहित्यिक पत्रिकाओं को भी
उनकी पुरानी शानो शौकत लौटा सकता है| गीतों के बारे में मैंने लिखा है -
कल्पवॄक्षों के
सुनहरे फूल हैं ये
दर्द की आकाशवाणी
के वचन हैं
तू इन्हे दिल के
खजाने में संजो ले
गीत ये जिन्दा
समन्दर के रतन हैं|
रामगिरि के यक्ष
से ये कब अलग हैं
और कब दमयन्तियों
से दूर हैं ये
जहर का प्याला
पिये सुकराते हैं ये
खुद ब खुद शूली
चढ़े मंसूर हैं ये
छोड़ने से भी ने
छूटेंगे कभी ये
भावना के मुँह
लगे आदिम व्यसन हैं |
अरविन्द राही: आपकी नजर में
गीतों के इस प्रकार विरोध का कारण क्या हो सकता है ?
सोम ठाकुर : राही जी गीतों का
विरोध कभी आम जनमानस ने नहीं किया, ये तो कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों का कॄत्य था जो अपने आपको
कवि के रूप में स्थापित करना चाहते थे, और इस प्रवॄत्ति के लोग आज भी हैं | महत्वपूर्ण पदों
व संस्थानों मे उपस्थित इन लोगों ने ही ये साजिशें रची| दरअसल गीत एक ऐसी
विधा है, जो हर किसी के वश
की बात नही| गीतों में
व्याकरण, शैली, शिल्प कथ्य,
भाषा, भाव आदि सभी का
निर्वाह गम्भींर सर्मपण की मांग करता है | कविता के पारम्परिक स्वरूप में समयानुसार परिवर्तन की बात
तो समझ में आती है, परन्तु अपनी
सुविधा के लिये कविता के मूल गुणधर्म को ही तिलांजलि दे देना कदापि स्वीकार्य नहीं
हो सकता| कम से कम आम
जनमानस तो नहीं ही स्वीकार करेगा|
अरविन्द राही : दादा आपने जब मंचों पर पदार्पण किया, उस समय पारम्परिक
गीतों का बोलबाला था जो बाद में नवगीत में ढ़ला, फिर आजकल
उत्तर नवगीत की बात होने लगी है ........
सोम ठाकुर : (बीच मे ही टोकते
हुए) ये उत्तर नवगीत क्या है ,मेरी समझ मे
ये नहीं आया कि ये कौन सा गीत है ?
अरविन्द राही :दरअसल इस विषय पर बहुत स्पष्ट तौर से कुछ
कहने की स्थिति में मैं भी नही हूँ , परन्तु उत्तर नवगीत पर आजकल बातें हो रही है| इस विषय में जहाँ
तक मैंने पढ़ा है और लोगों से जो चर्चा की है, उसमें एक बात निकलकर आयी कि ये गीतों को वैज्ञानिक कसौटी पर
कसने की प्रक्रिया है, जो कि न तो मुझे
हजम हो सकी ,न ही कुछ समझ में आयी|
सोम ठाकुर : उत्तर नवगीत की
लोग सिर्फ बातें ही करते हैं, कहीं स्पष्ट तौर पर कुछ सामने नहीं आता| जैसे मैने कही पढ़ा है- उत्तर नवगीत
का नाम परन्तु संदर्भ विस्मॄत हो रहा है| हाँ आप अपनी बात कहें, क्या कह रहे थे विज्ञान की कसौटी क्या है ?
अरविन्द राही : दादा
मैं ये कह रहा था कि लोगों से जो चर्चा हुर्इ उसके आधार पर कहूं तो ये नवगीत के
आगे की प्रक्रिया है, जिसमें गीतों में
एक वैज्ञानिक सोच शामिल है|
लेकिन ये आगे की
प्रक्रिया मात्र कुछ देना तो शब्दबोध हो सकता है भावबोध नहीं| रही वैज्ञानिकता
की बात तो ये बातें तो दिनकर जी या फिर वीरेन्द्र मिश्र की रचना हाथों में थामे
हुए खूनी यूरेनियम में बहुत पहले ही आ चुकी है| इस संदर्भ में आपका अभिमत क्या है ?
सोम ठाकुर : देखिये उत्तर नवगीत को नवगीत से आगे की चीज कर
देने से काम नहीं चलेगा| इसका कोर्इ
उदाहरण हों ,व्याकरण हो या अन्य साहित्यिक मापदण्ड तय हों तब तो ठीक अन्यथा भ्रम
की स्थिति बनी रहेगी|
अरविंद राही- वर्तमान में जो नवगीत लिखे जा रहे है उनके बारे
में आप क्या कहना चाहेंगें ,उन्हें आप कैसे देखते हैं ?
सोम ठाकुर : देखिये वर्तमान में जो नवगीत लिखे जा रहे हैं
उसकी गति धीमी है और प्रवाह बाधित सा जान पड,ता है साथ ही संप्रेषणीयता का भी अभाव दिखार्इ पड,ता है| रदीफ को नवगीत
वालों ने गायब ही कर दिया है, सिर्फ तुकान्त है| यही अब जैसे :
लौट आओ माँग के सिन्दूर की सौगन्ध तुमको
नयन का सावन
निमन्त्रण दे रहा है,
यह अकेला मन
निमन्त्रण दे रहा है|
निमन्त्रण दे रहा है , यह रदीफ है जो
बहुत बड़ी शक्ति होता है|
जब रदीफ ही गायब
हो जायेगा तो फर्क तो पड़ेगा ही| हाँ एक अच्छा
कार्य ये हुआ है कि इन्होने एक नयी इमेजरी दी, एक नया मुहावरा गढ़ा है| नयी कविता ने भी एक बहुत अच्छा काम ये किया है कि उसने अब
तक केवल वर्गिक चित्रण की बात की थी ,अब
इन लोगों ने खण्ड – खण्ड करके उसके
भावबोध को उकेरा है जो अच्छा है| नयी कविता फ्रेंचपेंटिग से चली है जिसके प्रवर्तक महान
चित्रकार पिकासो थे। अधिकांश कलात्मक आन्दोलनों की शुरूवात फ्रांस से हुर्इ है,
उसी में नयी कविता भी है|
ये लोग इसमें
विश्वास करते हैं कि जब तक हम किसी को देखते है तो जब तक वो हमारे सामने आये तब तक
तो एक – एक पत्ती की नब्ज
आदि सब दिखायी दे रही है परन्तु जब वो हट जाता है तो एक धुँधला चित्र हमारे मानस
पटल पर शेष रह जाता है, वही सच्चा है ,वही
स्थायी है| तो कविता जो है
वो अस्पष्ट रहेगी तो संप्रेषण नहीं होगा ,इसीलिये नयी कविता को आम जनमानस ने नकार
दिया|
अरविन्द राही : दादा ये अगीत क्या है ?
सोम ठाकुर : भार्इ
ये तो समझ के परे की चीज है | रंगनाथ मिश्र ने अगीत की बात शुरू की, अगीत जिसमें गीत
तत्व न हो, तो जिसमें गीत
तत्व ही नहीं होगा, रागात्मकता नहीं
होगी उसे कविता माना भी जाय तो कैसे, रंगनाथ मिश्र भी इसको स्पष्ट नहीं कर पाये और
हम तो इसके पक्ष में हैं ही नहीं|
अरविन्द राही : आजकल नवागंतुक रचनाकारों का रूझान तेजी से ग़ज़लों
की ओर बढ़ा है चाहे वो हिन्दी हो, उर्दू हो या अन्य भाषा की इससे कहीं न कहीं गीतों पर प्रभाव पड़ा है| इसे आप कैसे
देखते है ?
सोम ठाकुर : हमारे यहाँ आजकल जो ग़ज़लें लिखी जा
रही है ,उन्हें मैंने नाम दिया है नागरी ग़ज़ल| ग़ज़लें लिखी तो बहुत जा रही हैं परन्तु ,उनमें गुणवत्ता का घोर अभाव है| अच्छी ग़ज़लें कम
लिखी जा रही हैं| गुरू शिष्य परम्परा के ह्रास का भी प्रभाव दिखायी पड़ रहा है| कच्ची कवितायें
सामने आ रही हैं, संशोधित कवितायें
नहीं आ रहीं|
जहाँ तक गीतों के प्रभावित होने की बात तो ये सच है कि ग़ज़ल में छूट
ज्यादा है| गीतों मे बहुत
मेहनत करनी पड़ती है, इसलिये मेहनत से
बचने के लिये भी बहुत से नवागंतुक रचनाकार ग़ज़ल की ओर मुड़ जाते हैं|
अरविन्द राही : दादा आजकल सहिष्णुता असहिष्णुता के नाम पर
पुरस्कार वापसी का एक दौर सा चल पड़ा है, इसे आप कैसे देखते हैं ?
सोम ठाकुर : राही जी पुरस्कार तो कत्तर्इ वापस नहीं किये
जाने चाहिये| मैं इस पक्ष में
नही हूँ| आपको जो पुरस्कार
दिया गया है आपकी रचनाधर्मिता या कला के वैशिष्ट्ये के कारण दिया गया है, पुरस्कार वापस
करने का अर्थ है -उसको नकारना ,जो उचित नहीं है| फिर इससे न तो साहित्य का भला होना है न समाज का| ये विरोध का
अनुचित तरीका है जिसका समर्थन नहीं किया जा सकता|
अरविन्द राही : चलते चलते
एक प्रश्न का उत्तर आपसे और पाना चाहेंगे कि आपने पूरे देश में तो गीतों की गंगा
बहायी ही, साथ ही विदेशों
में भी विशेषकर अमेरिका, कनाडा, मारीशश आदि में भी
गीतों की प्रस्तुतियाँ दीं|
हम जानना चाहते
हैं कि क्या आपने फिल्मों में भी गीत लिखे हैं ?
सोम ठाकुर :जी हाँ राही जी, सलिल चौधरी के संगीत निर्देशन में मेरे भइया
फिल्म में मेरा गीत है| और भी कर्इ
फिल्मी गीत लिखे, परन्तु फिल्मों
में अधिक समय न देकर मंचों और पत्रों के माध्यम से ही ज्यादा सक्रिय और संतुष्ट
रहा|
अरविन्द राही : दादा आज
की पीढ़ी को क्या सन्देश
देना चाहेंगे|
सोम ठाकुर : मैं इतना ही कहूँगा कि वर्तमान पीढ़ी बहुत ही ऊर्जावान
है, बस आवश्यकता है सर्मपण
की| आप खूब पढ़ें, सोचे समझें ,स्वयं
के स्तर पर विवेचन करें, फिर लिखें| जो लिखें, सार्थक लिखें| इस नयी पीढ़ी को मैं अपनी ढेर सारी शुभकामनायें देता हूँ| खूब पढ़ें , खूब लिखें, आगे बढ़ें|