Friday, 10 February 2017

दंगल : पाँच प्वाइंट वाली फिल्म




फिल्मी पंडितों के इस आकलन को दंगल ने झूठा साबित कर दिया है कि वह दिन लद गये जब लोग सपरिवार फिल्में देखने आते थे।दंगल में एक संवाद है- कुश्ती में एक पाँच प्वाइंट का दाव है जो मुश्किल तो जरूर है लेकिन असंभव नहीं,उसी तर्ज पर कहें तो फिलहाल सपरिवार दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाना मुश्किल जरूर है लेकिन असंभव नहीं।

कुछ अति प्रगतिशीलता का जामा ओढ़े अहंवादी दंगल की यह कहकर आलोचना कर रहे हैं कि यह बाप के नजरिये से बनी फिल्म है जो सिस्टम को गलत ठहराती है जबकि सच यह है कि कहानी ही बाप की वजह से बन पायी है इसलिए बाप के नजरिये से न कहे जाने का सवाल ही नहीं उठता।रही बात सिस्टम के खामियों को उजागर करने की तो सिस्टम में जितना भ्रष्टाचार है फिल्म में उतना दिखा पाना संभव ही नहीं।खिलाड़ियों को अपने चुनाव से लेकर देशी विदेशी दौरों तक में कितने भेदभाव और अपमान भरी स्थितियों से गुजरना पड़ता है,यह छिपा नहीं रह गया है। आये दिन मीडिया में इस पर चर्चा होती रहती है।

कुछ लोग महावीर फोगट के देश के लिए स्वर्ण पदक लाने के सपने को भी देशभक्ति की खोल में पिरोने की संज्ञा दे रहे हैं,मानो देशभक्ति बहुत बुरी चीज हो और स्वर्ण पदक जीतने का सपना सिर्फ व्यक्तिगत होना चाहिए।रेसलिंग को लेकर यह पहली ऐसी फिल्म है जो अखाड़े और रिंग के अंतर को बताती है,साथ ही इंटरनेशनल रेसलिंग की बारीकियों और नियमों की जानकारी देती है।कुछ लोगों की संवेदना इतनी भोंथरी हो गयी है और देशप्रेम इतना लिजलिजा हो गया है कि फिल्म में राष्ट्रगान बजने के दौरान लोगों का भावावेश में उठ खड़ा होना भी उन्हें बहुत वाहियात लग रहा है और वे चटखारे लेकर यह बताने में कोई शर्म महसूस नहीं कर रहे हैं कि यार अपन तो आराम से बैठे रहे।

दंगल जैसी फिल्म वर्षों वर्षों में कोई एक बनती है...इसे पाकर कोई भी राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार धन्य हो सकता है।एक बायोपिक विषय को फीचर फिल्म के ढ़ाँचे में पूरे मनोरंजक तत्त्वों के साथ पेश करने के लिए अभिनेता आमिर खान और निर्देशक नितेश तिवारी की जितनी भी तारीफ की जाय कम है।

हाँ एक कसक मन में रह गयी आमिर की जवानी के दस पाँच सीन होते तो और अच्छा लगता....प्रचार में तो यह खूब कहा गया था कि बुढ़ापे और जवानी दोनों समय के सीन हैं जबकि युवा आमिर के मुश्किल से दो तीन मोंटाज वाले सीन हैं....!

काबिल काबिलेतारीफ है....



एक अंधा व्यक्ति जो डबिंग आर्टिस्ट है,किस प्रकार अपने आवाज की हुनर के बदौलत अपनी पत्नी के रेपिस्टों/हत्यारों से बदला लेता है,इसकी कहानी है काबिल।

आप कह सकते हैं कि कहानी पूरी फिल्मी है लेकिन निर्देशक ने पटकथा एवं संवादों के जरिये कहानी को जिस प्रकार प्रस्तुत किया है,वह दिल को छुए बिना नहीं रहती।पर्दे पर रेप सीन दिखाने का मोह बड़े बड़े निर्देशक नहीं छोड़ पाये हैं जिनमें कला फिल्मों के झंडाबरदार भी हैं(क्योंकि यह सीन देखने के लिए एक खास वर्ग बार बार सिनेमाघरों का रुख करता है) । तमाम बड़ी हिरोइनों को रीयल सिनेमा के नाम पर या कहिए कैरियर बचाये रहने की मजबूरी में यह सीन करते रहना पड़ा है।काबिल के निर्देशक भी शायद ही इसका मोह छोड़ पाते अगर फिल्म के निर्माता राकेश रोशन न होते ।राकेश रोशन एक अनुभवी फिल्मकार हैं और वे यह राज जानते हैं कि जब तक सॉलिड कहानी न हो, सिर्फ रेप सीन का बोल्डनेस किसी फिल्म को हिट या फ्लॉप नहीं करा सकता,अगर इस मोह में एक बड़ा वर्ग सिनेमा से जुड़ता है तो एक बड़ा वर्ग कट भी जाता है जो सपरिवार फिल्में देखने आता है।फिल्म में रेप के सीन को बड़े सलीके से एक छोटे से सीन में निपटा दिया गया है।

भरतमुनि ने नाट्यशास्त्र में लिखा है कि अश्लील और हिंसात्मक दृश्यों की सूचना भर होनी चाहिए,उनका वीभत्स चित्रण नहीं क्योंकि दर्शकों के मन पर इसका बुरा प्रभाव पड़ता है।काश हमारे दूसरे निर्माता निर्देशक भी इस बात को समझ पाते?पुलिसतंत्र किस तरह नेताओं के इशारे पर चलता है और उनके मनी और मसल पावर के कारण आम आदमी कितना बेबस और लाचार है,कहानी में इस सूत्र को भी धारदार संवादों के जरिए रखा गया है।पुलिस अधिकारी प्रमुख के रूप में नरेंद्र झा की ओजस्वी संवाद अदायगी और सधा हुआ अभिनय उन्हें हिंदी सिनेमा में दूर तक ले जाएगा,ऐसी उम्मीद बँधती है।
 निर्माता राकेश रोशन,निर्देशक संजय गुप्ता,संवाद लेखक संजय मासूम समेत फिल्म से जुड़े सभी सदस्य बधाई के पात्र हैं।

रईस जैसी फिल्में क्यों बननी चाहिए ?


कलाओं का उद्देश्य मनुष्य को उदात्त बनाना और एक बेहतर समाज का निर्माण करना है न कि गलत उदाहरणों को जस्टीफाई करना।अगर किसी ने गलत रास्ते पर चलकर शोहरत और दौलत कमा लिया हो तो उसे महिमामंडित क्यों किया जाना चाहिए ?हिंदी सिनेमा के एक बड़े स्टार को उसकी भूमिका क्यों निभानी चाहिए?हमारे नेता भ्रष्ट हैं,जाति और मजहब के नाम पर जनता को भड़काकर अपना उल्लू सीधा करते हैं,यह बतानेवाली जाने कितनी ही फिल्में बन चुके हैं,रईस में वह सब कुछ भी अपने उसी दुहराव के साथ उपस्थित है।

हाजी मस्तान ,अरुण गवली से लेकर जाने कितने ही छोटे बड़े अपराधी जीवन के उत्तरार्द्ध में शरीफ बनकर जनसेवा के कार्यों में लग जाते हैं तो क्या उनके जुर्मों को भुलाकर चौराहों पर मूर्तियां लगवा देनी चाहिए?पुरानी कहावत है कि गंदगी पर पर्दा डालना चाहिए न कि उसे उकेर कर दिखाना चाहिए।ऐसे अपराधियों का पुलिस जब तक इनकाउंटर करती है,तब तक वे देश और समाज का बहुत अधिक नुकसान कर चुके होते हैं।फिल्म के आखिर में एक संवाद डाला गया है- इंस्पेक्टर साहब क्या मेरे मर्डर के खयाल के साथ आप जी पाएंगे?ऐसा क्यों भाई,तुमने जीवन में ऐसा क्या किया था?अगर कोई अपराधी अपने बीवी/बच्चों/लोगों को बचाने मोह में आत्मसमर्पण करता है तो क्या उसका अपराध कम हो जाता है ?रईस को इस बात का अफसोस है कि उससे धोखे से आरडीएक्स पार करवा लिया गया है जबकि शराब का धंधा करने में उसे कोई ग्लानि नहीं है।बम से तो लोग एक ही बार में मर जाते हैं जबकि नशे की गिरफ्त में आकर एक व्यक्ति न सिर्फ तिल तिल मरता है बल्कि उसके पूरे परिवार की ज़िंदगी नर्क हो जाती है।

भाई शाहरुख खान क्यों कर रहे हो ऐसी वाहियात फिल्म ?lकलाकार का भी कोई सामाजिक दायित्व / सरोकार होता है कि नहीं....अगर तुम इस बात को बिल्कुल नहीं समझना चाहते तो मुझे और कुछ नहीं कहना....!