दंगल : पाँच प्वाइंट वाली फिल्म
फिल्मी पंडितों के इस आकलन को दंगल ने झूठा साबित कर दिया है कि वह दिन लद गये जब लोग सपरिवार फिल्में देखने आते थे।दंगल में एक संवाद है- कुश्ती में एक पाँच प्वाइंट का दाव है जो मुश्किल तो जरूर है लेकिन असंभव नहीं,उसी तर्ज पर कहें तो फिलहाल सपरिवार दर्शकों को सिनेमाघरों तक लाना मुश्किल जरूर है लेकिन असंभव नहीं।
कुछ अति प्रगतिशीलता का जामा ओढ़े अहंवादी दंगल की यह कहकर आलोचना कर रहे हैं कि यह बाप के नजरिये से बनी फिल्म है जो सिस्टम को गलत ठहराती है जबकि सच यह है कि कहानी ही बाप की वजह से बन पायी है इसलिए बाप के नजरिये से न कहे जाने का सवाल ही नहीं उठता।रही बात सिस्टम के खामियों को उजागर करने की तो सिस्टम में जितना भ्रष्टाचार है फिल्म में उतना दिखा पाना संभव ही नहीं।खिलाड़ियों को अपने चुनाव से लेकर देशी विदेशी दौरों तक में कितने भेदभाव और अपमान भरी स्थितियों से गुजरना पड़ता है,यह छिपा नहीं रह गया है। आये दिन मीडिया में इस पर चर्चा होती रहती है।
कुछ लोग महावीर फोगट के देश के लिए स्वर्ण पदक लाने के सपने को भी देशभक्ति की खोल में पिरोने की संज्ञा दे रहे हैं,मानो देशभक्ति बहुत बुरी चीज हो और स्वर्ण पदक जीतने का सपना सिर्फ व्यक्तिगत होना चाहिए।रेसलिंग को लेकर यह पहली ऐसी फिल्म है जो अखाड़े और रिंग के अंतर को बताती है,साथ ही इंटरनेशनल रेसलिंग की बारीकियों और नियमों की जानकारी देती है।कुछ लोगों की संवेदना इतनी भोंथरी हो गयी है और देशप्रेम इतना लिजलिजा हो गया है कि फिल्म में राष्ट्रगान बजने के दौरान लोगों का भावावेश में उठ खड़ा होना भी उन्हें बहुत वाहियात लग रहा है और वे चटखारे लेकर यह बताने में कोई शर्म महसूस नहीं कर रहे हैं कि यार अपन तो आराम से बैठे रहे।
दंगल जैसी फिल्म वर्षों वर्षों में कोई एक बनती है...इसे पाकर कोई भी राष्ट्रीय अंतरराष्ट्रीय पुरस्कार धन्य हो सकता है।एक बायोपिक विषय को फीचर फिल्म के ढ़ाँचे में पूरे मनोरंजक तत्त्वों के साथ पेश करने के लिए अभिनेता आमिर खान और निर्देशक नितेश तिवारी की जितनी भी तारीफ की जाय कम है।
हाँ एक कसक मन में रह गयी आमिर की जवानी के दस पाँच सीन होते तो और अच्छा लगता....प्रचार में तो यह खूब कहा गया था कि बुढ़ापे और जवानी दोनों समय के सीन हैं जबकि युवा आमिर के मुश्किल से दो तीन मोंटाज वाले सीन हैं....!