सबसे कम खर्चा और सबसे अधिक चर्चा
रासबिहारी पाण्डेय
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इन दिनों सोशल मीडिया पर अभिनेता रणदीप हुड्डा और मॉडल लिन लैशराम की शादी की खूब चर्चा है। समर्थ होते हुए भी इन्होंने अपनी शादी को फिजूलखर्ची से दूर रखा और बहुत सादगीपूर्ण ढंग से मणिपुर की परंपरागत मैतेई रीति से विवाह की रस्में पूरी की।बड़े ड्रेस डिजाइनरों को नकारते हुए रणदीप ने मैतेई रीति से शादी के लिए परंपरागत सफेद वस्त्र पहने थे,साथ ही एक बड़ी सफेद चादर ओढ़ रखी थी। लिन लेशराम ने पोटली पहनी थी जो मोटे कपड़े और मजबूत बांस से बनी होती है।गले में राजकुमारियों की तरह सजेआभूषण उनकी शोभा में चार चाँद लगा रहे थे। लिन हाल ही में करीना कपूर अभिनीत फिल्म जाने-जां में दिखी थीं।वे हैंड क्राफ्ट ज्वेलरी 'शमू शना' की फाउंडर भी हैं।
आमतौर पर मशहूर शख्सियतें शादियों को एक बड़ा इवेंट बना देती हैं।चार्टर्ड प्लेन से आने वाले मेहमानों, बड़े अभिनेता-अभिनेत्रियों की नृत्य प्रस्तुति, सैकड़ों प्रकार के लजीज व्यंजन और पेय पदार्थ,महंगे होटलों में की जाने वाली महंगी सजावट आदि मीडिया की खबरें बन जाती हैं। इतना सब कुछ होने के बावजूद कुछ दिनों बाद खबर आती है कि पति पत्नी के रिश्ते सामान्य नहीं रह गए हैं और कुछ ही दिनों में तलाक भी होने वाला है।
केंद्र सरकार द्वारा नोटबंदी के दौरान भी कर्नाटक के व्यवसायी पूर्व मंत्री जनार्दन रेड्डी की बेटी की शादी का उत्सव पांच दिनों तक चलता रहा। विशाल भव्यता और हैसियत जाहिर करने वाली इस शादी में करोड़ों रुपए खर्च हुए।मीडिया में इस शादी की इतनी चर्चा हुई कि रेड्डी को बाकायदा इडी की नोटिस भेजी गई।उसी दौरान मध्य प्रदेश के भिंड में दो आईएएस अधिकारियों आशीष वशिष्ठ और सलोनी की शादी इसलिए चर्चा में रही क्योंकि उन्होंने भव्य प्रदर्शन से किनारा करते हुए सीधे कोर्ट में जाकर शादी कर ली। शादी के दिखावे से अधिक उन्हें अपने काम से प्यार था।सूरत में संपन्न हुई भरम मारू और दक्षा परमार की शादी में मेहमानों को सिर्फ चाय परोसी गई थी जिसका जिक्र प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने रेडियो कार्यक्रम मन की बात में भी की।शादियों में जो लोग दहेज नहीं लेने का ढ़ोंग करते हैं,उन्हें भी अक्सर मैंने यह कहते हुए सुना है कि हमारे मेहमानों का स्वागत सत्कार अच्छे ढंग से होना चाहिए बस, बाकी तो जो देना होगा आप अपनी लड़की को ही देंगे। मात्र एक शब्द 'स्वागत सत्कार' में पूरा विलास छुपा होता है।खान-पान, रहन-सहन और विदाई में थोड़ी भी कमी रह गई तो समधी जी की भृकुटि तन जाती है।
भारतीय जनमानस शादियों को शक्ति प्रदर्शन की तरह लेता है। जो अमीर हैं उन्हें तो कोई फर्क नहीं पड़ता लेकिन सामान्य परिवारों के लोग भी शादियों के लिए अपने सारे जीवन की कमाई रकम खर्च करने से गुरेज नहीं करते।कुछ लोग तो ऊँचे ब्याज दरों पर कर्ज लेकर भी यह शौक पूरा करते हैं।आज भी ऐसे अनेक परिवार हैं जिनके लिए विवाह का खर्च उठाना मुश्किल है।उत्तर भारतीय नेता चंद्रशेखर शुक्ला हर वर्ष अपने गृह जनपद में ऐसे सामूहिक विवाह अपने खर्चे से संपन्न कराते हैं। देशभर में ऐसे अनेक समाजसेवी हैं जो प्रकट या गुप्त रूप से शादियों में अपना योगदान देते हैं। समर्थ लोगों की सादगीपूर्ण शादियों से सबक लेते हुए आमजन को भी लोक लाज का भय त्याग कर अपने सामर्थ्य के अनुसार ही विवाह संस्कार संपन्न करना चाहिए।