कहानी
गवर्नर साहब की
विदेश यात्रा ....
गवर्नर साहब की अध्यक्षता में लखनऊ हिंदी भवन में कवि सम्मेलन चल रहा था।पाँच कवि कविता पाठ कर चुके थे,लेकिन गवर्नर साहब ने अब तक किसी को दाद नहीं दी थी।वे चेहरे को भावशून्य बनाये गंभीरता का लबादा ओढ़े किसी चिंतक की मुद्रा में बैठे थे।तभी संचालक विवेक प्रकाश ने सुमनिका का नाम पुकारा।सुमनिका का नाम सुनते ही गवर्नर साहब के चेहरे पर खुशी की किरणें दौड़ गईं।सुमनिका ने माइक पर आते ही गवर्नर साहब की खिदमत में चार पंक्तियाँ पेश की।हॉल तालियों से गूँज उठा।सुमनिका बार बार गवर्नर साहब को संबोधित और समर्पित करते हुए प्यार भरे मुक्तक और रुबाइयाँ पढ़ती जा रही थी,हालाँकि मुक्तक और रुबाई का अंतर उसे खुद पता नहीं था।रुबाई को मुक्तक और मुक्तक को रुबाई और कभी मेरी ये चार पंक्तियाँ और सुनिए...कहते हुए सुमनिका ने अपना काव्य पाठ जारी रखा।गवर्नर साहब हर चौथी पंक्ति पर तालियाँ बजाने लगते और वाह वाह,बहुत खूब,क्या कहने जैसे जुमले उछाल देते।सुमनिका ने इन चार चार पंक्तियों के बाद एक गीत सुनाया और गीत की समाप्ति के बाद गवर्नर साहब के चरण छुए।
गवर्नर साहब ने बड़े प्यार से उसके सर पर हाथ फेरा और यशस्वी भव....कहते हुए उसके गाल पर हल्की चपत लगाई।
फिर धीरे से बोले – इस बार तुमको भी अमेरिका ले चलूँगा।संपर्क में रहो।इसके तुरत बाद गवर्नर साहब अपने पूरे लाव लश्कर के साथ किसी अन्य कार्यक्रम के लिए रवाना हो गए।
अगल बगल बैठे कवियों ने आँखों ही आँखों में एक
दूसरे से कुछ बातें की और होठों ही होठों में मुस्कुराने लगे।एक कवि ने दूसरे के
कान में कहा- एक मिसरा हुआ है....अच्छा हुआ कि उठ के दर्दे सर चले गए....दूसरे ने
कहा ...बोझा बने हुए थे गवर्नर चले गए....दोनों ने एक दूसरे के हाथ पर ताली दी और
धीमे स्वर में हँसने लगे।
सुमनिका मारे खुशी के पागल हो रही थी।इस घड़ी का
इंतजार उसे वर्षों से था।उसका दिल बल्लियों उछल रहा था।पहली बार किसी इतनी बड़ी
राजनीतिक हस्ती ने उसके सिर पर हाथ रखा था।वह मन ही मन सोचने लगी....तो क्या उसका
अमेरिका जाने का ख्वाब पूरा हो जाएगा...उसका कविता संकलन किसी प्रतिष्ठित प्रकाशन
संस्थान से आ जाएगा... क्या उसे भी कोई सरकारी पुरस्कार मिल जाएगा.....उसके दिल ने
जवाब दिया क्यों नहीं ...अगर गवर्नर साहब उसके ऊपर रीझ जायें तो यह सब तो उनके
बायें हाथ का खेल है....तभी विवेक प्रकाश का नंबर उसके मोबाइल स्क्रीन पर चमका।हिंदी
भवन के कार्यक्रम में विवेक ने ही उसे प्रस्तुत किया था।विवेक का नंबर उठाते हुए
वह बोली – हाँ सर....हिंदी भवन के कार्यक्रम में कविता पढ़वाने के लिए आपका बहुत
बहुत धन्यवाद।
अरे धन्यवाद कैसा....तुम डिजर्व करती हो..
मगर आप प्रयास न करते तो मेरी सारी योग्यता धरी
की धरी रह जाती...इतने बड़े कार्यक्रम में मेरा नाम आना मुश्किल था।
हम प्रयास क्यों न करते भला....तुम्हारे जैसी
सुमुखि,सुलोचनि,पिकबचनि के लिए.....
अरे इतने भारी भरकम शब्दों का इस्तेमाल मेरे लिए
मत करिए....वैसे यह शब्दावली कहाँ से उद्धृत कर रहे हैं?
रामचरितमानस से....दशरथ ने कैकयी के लिए कहा
है....
ओहोहो ..... शुक्रिया शुक्रिया .....और बताइए....
देखना गवर्नर साहब जरा लँगोट के कच्चे हैं
.....हर वर्ष नई नई चिड़ियों को फाँस कर साहित्य समारोहों की आड़ में विदेश की सैर
पर ले जाते हैं और ....आगे तो तुम समझ ही सकती हो....सावधान रहना जरा...
क्या बात कर रहे हैं सर ....उम्र में तो वे हमारे
पिता के समान हैं।
हाँ दुनिया की नजर से बचने के लिए वे बेटी का
रिश्ता भी बहुत जल्द गाँठ लेते हैं,सभा समारोहों में बिटिया बिटिया कहते भी नहीं
थकते मगर काम वही सब करते हैं जो बिगड़े शोहदों के होते हैं- कहते हुए विवेक ने
फोन पर ठहाका लगाया।
सुमनिका ने शरमाने का अभिनय करते हुए कहा- धत्
....आपके मन में भी पता नहीं क्या क्या चलता रहता है...एक आपसे दिल क्या लगा लिया
कि आप मुझे भी वही समझने लगे...
अरे वो बात नहीं है...मैं तो मजाक कर रहा था
देवी....
ऐसा मजाक करके मेरा दिल मत दुखाया करिए...
तो कैसा मजाक करूँ....कहते हुए विवेक ने फिर
ठहाका लगाया....
आपसे जीत पाना मुश्किल है....टॉपिक चेंज
करिए....ये बताइए अगले महीने के कवि सम्मेलनों की तारीख अभी पक्की हुई कि नहीं....?
पेमेंट की बात एक दो दिन में फाइनल हो जाएगी.... फिर
बताता हूँ......
देखिए रमणिका को लेकर मत चले जाइएगा।देख रही हूँ
पिछले कई कवि सम्मेलनों में वह आपके साथ थी।
भरोसा डगमगा रहा है,तभी तो ऐसा कह रही हूँ....
ये लो बुढ़ापे में हमें अब कौन मिल रहा है...
तो क्या तुम मुझको मटुकनाथ समझ रही हो ....
सुमनिका हँसने लगी....अरे नहीं...मजाक कर रही
हूँ।
विवेक के मोबाइल पर एक दूसरा नंबर चमका...वे
बोले- सुमनिका!एक दूसरी कॉल आ रही है।बाद में बात करते हैं।
विवेक ने दूसरा फोन लिया- बोलो रमणिका.....कैसी
हो ?
अच्छा है सर....हिंदी भवन का कार्यक्रम कैसा रहा
....?
बहुत अच्छा रहा...
हाँ.... जिस कार्यक्रम की बागडोर आप जैसे
सिद्धहस्त संचालक के हाथ में होगी,उसको तो सफल होना ही है।मगर सर मैं आपसे रूठी
हुई हूँ.... आपने मेरा नाम वहाँ क्यों नहीं दिया .... ?
रूठी हो तो मना लूँगा ...वैसे तुम्हारे भोलेपन पर
एक शेर याद आ रहा है...इस सादगी पर कौन न मर जाय ऐ खुदा,लड़ते हैं और हाथ में
तलवार भी नहीं....!
शेर और कविताएँ तो आपको हजारों याद हैं सर,मुझे उसमें मत उलझाइये...सच सच बताइये क्या
सुमनिका मुझसे बड़ी कवयित्री है जो उसे आप वहाँ ले गए और मुझे नहीं ....आखिर हम
दोनों को लिखकर तो आप ही देते हैं.....?
मुझ पर ऐसा आरोप मत लगाओ रमणिका...मैं सिर्फ
तुम्हें लिखकर देता हूँ,उसे नहीं....लगता है किसी ने तुम्हारे कान भरे हैं...सुमनिका
तुमसे वरिष्ठ है..... उसके भी लोगों से संबंध हैं,किसी मंत्री विधायक ने उसका नाम
आयोजन से जोड़ा होगा....
लेकिन इस बार तो कवि सम्मेलन की टीम आपने बनाई
थी...
हाँ मुझसे कुछ लोगों का नाम सजेस्ट करने के लिए
कहा गया था लेकिन मैंने जिन जिन लोगों का नाम दिया था,उन सारे लोगों का नाम शामिल
नहीं किया गया।तुम्हारा भी नाम दिया था मैंने.... मगर उन लोगों ने कट कर दिया तो
क्या करूँ... सरकारी लोगों से संबंध बनाकर रखना पड़ता है।आज नहीं तो कल तुम्हारा
नाम भी शामिल हो जाएगा....
खैर छोड़िए....अगले महीने हमें कहाँ ले चल रहे
हैं....
तीन चार कार्यक्रमों की बात चल रही है....फाइनल
होते ही बताता हूँ.....अच्छा मुझे कॉलेज के लिए देर हो रही है...इतमीनान से बाद
में बात करते हैं- कहकर विवेक प्रकाश ने फोन रख दिया।
विवेक प्रकाश कानपुर के एक महाविद्यालय में हिंदी
के प्राध्यापक थे।कवि सम्मेलनों की दुनिया में उनकी तूँती बोलती थी।स्वयं भले
अच्छे कवि नहीं थे,लेकिन भीड़ से तालियाँ बजवाने की कला में माहिर थे।हिंदी,उर्दू
के सभी महत्वपूर्ण कवियों की खास खास कविताएँ उन्हें याद थीं।कैसी भी जगह पर कवि
सम्मेलन रखा गया हो,संचालन ऐसा करते थे कि महफिल जम जाती थी।
कवि सम्मेलनों के
आयोजक ऐसे ही कवियों को ढ़ूँढ़ा करते हैं,जिन्हें अपने कार्यक्रम की बागडोर सौंपकर
वे निश्चिंत हो जाएँ।कवि सम्मेलन में कहाँ कहाँ से कितने बड़े कवि आ रहे हैं,इससे
महत्वपूर्ण होता है,इसका संचालन कौन कर रहा है।भीड़ की तालियाँ बजती हैं या नहीं,
वंसमोर की आवाज होती है या नहीं।यही सब आयोजकों को स्पांसर और अगले कार्यक्रम देते
हैं।विवेक प्रकाश इस लिहाज से एक सफल कवि थे।नवोदित कवि कवयित्रियाँ उनके पीछे
पीछे लगे रहते थे।फिल्मकार यश चोपड़ा की तरह नये लड़कों को उन्होंने कभी भाव नहीं
दिया।हाँ! कुछ लड़कियों को जरूर मौके दिए मगर पिछले तीस
साल में कोई एक भी कवि सम्मेलनों की दुनिया में बनी नहीं रह सकी।
फिलहाल विवेक प्रकाश की उम्र पचपन साल है।दो वर्षों से वे रमणिका और सुमनिका से आँख मिचौली खेल रहे थे।दोनों को यह पता भी है लेकिन कवि सम्मेलनों में मिलनेवाली तालियों और लिफाफे के मोह में वे जानबूझकर अनजान बनी हुई थीं।दोनों को उनसे अच्छा कोई मिल भी नहीं रहा था।दोनों को खुद लिखने पढ़ने में कोई रुचि नहीं था।कवि सम्मेलनों में जमनेवाली चार छह कविताएँ विवेक प्रकाश ने दे रखी थीं,इससे ही उनका काम चल जाता था।दोनों अब विदेश यात्रा और सरकारी पुरस्कारों की जुगाड़ में थीं।इसके लिए किसी राजनीतिक हस्ती से घनिष्ठता की जरूरत थीं।दोनों किसी ऐसे शख्स की तलाश में थीं।
सुमनिका की तलाश पूरी हो चुकी थी।नई सरकार बनने
के बाद संयोग से राजधानी में एक ऐसे राज्यपाल आए थे जो न सिर्फ स्वयं कविताएँ
लिखते थे बल्कि पसंदीदा कवि और कवयित्रियों को विदेश यात्रा पर ले जाने के लिए
कुख्यात भी थे।कुख्यात इसलिए कि उनके साथ जानेवाले अधिकतर कवि कवयित्रियाँ बहुत
सामान्य स्तर के होते थे। न तो समय और समाज के दबावों पर उनकी कोई पकड़ होती थी, न
ही देश और राजनीति को दिशा दे पाने का उनमें कोई मौलिक चिंतन होता था।उनमें सिर्फ तीन
तरह के लोग होते थे - आरोह अवरोह के साथ शेर पढ़नेवाले सुरीले कंठ के शायर,महबूब
से रोमांस करनेवाली या उसके विरह में गीत गानेवाली कवयित्रियाँ या नारेबाजी करके
देशभक्ति की कविताएँ पढ़नेवाले वीर रस के कवि।जिन कवियों की साहित्यिक प्रतिष्ठा
होती थी,उनके आगे वे स्वयं को बौना महसूस करते थे,इसलिए उन्हें कभी बुलाते ही नहीं
थे।
सुमनिका राज्यपाल महोदय से कवि सम्मेलन में मिल
चुकी थी।अब राजभवन में मिलना जरूरी था।उसे पता था कि बिना घनिष्ठता हुए विदेश
यात्रा मुश्किल है।उसने राजभवन में फोन किया।उसे अगले हफ्ते गुरूवार को मिलने का
समय मिल गया।तय समय पर वह गवर्नर हाउस पहुँची।कठिन चेकिंग से गुजरने के बाद वह
राजभवन के भीतर पहुँची।गवर्नर साहब सोफे पर बैठे अखबार पढ़ रहे थे।सुमनिका ने उनका
पाँव छूना चाहा।गवर्नर साहब ने कहा- यह क्या कर रही हो ....आओ गले मिलो.... वे
सुमनिका को दो मिनट तक सीने से लगाये रहे,फिर कमर में हाथ लगाकर बगल में बिठा
लिया।
अगले हफ्ते राज्यपाल के साथ विदेश जानेवाले
कवियों की सूची प्रेस विज्ञप्ति के रूप में छपी तो विवेक प्रकाश हैरान रह गए।उन्होंने
स्वयं के अलावा जो चार नाम दिये थे,वे तो थे लेकिन उनका ही नाम गायब था।लेकिन जैसे
ही उन्होंने सूची में सुमनिका का नाम देखा,तुरत सारा मामला उनकी समझ में आ गया।उन्होंने
अपना माथा पीट लिया।उन्हें तत्काल अपने प्रिय कवि तुलसीदास के दोहे की एक पंक्ति
याद आ गयी....का नहिं अबला कर सके, का न समुद्र समाइ ।