नेहरू सेंटर में इन दिनों नाट्य उत्सव चल रहा है।हिंदी,मराठी और गुजराती के कुल पाँच नाटक प्रस्तावित हैं। इसी क्रम में गत मंगलवार को अभिनेता /निर्देशक विजय कुमार की संस्था 'मंच' द्वारा मोहन राकेश लिखित नाटक आधे अधूरे का मंचन हुआ। 'आधे अधूरे'का पहला मंचन दिल्ली में ' दिशांतर ' नाट्य समूह द्वारा ओम शिवपुरी के निर्देशन में फरवरी 1969 में हुआ जिसमें ओम शिवपुरी,सुधा शिवपुरी अनुराधा कपूर, ऋचा व्यास और दिनेश ठाकुर ने मुख्य भूमिकाएं निभाई थीं। तब से अब तक देश के तमाम नाट्य समूहों द्वारा लगातार इसकी प्रस्तुतियां जारी हैं। नई पुरानी सभी नाट्य संस्थाओं के लिए यह नाटक एक कसौटी की तरह है जिस पर सभी अपने आपको कसना चाहते हैं। यह नाटक महानगरीय जीवन के जिस संदर्भ को लेकर लिखा गया है, वह बदले परिवेश में और विद्रूपता के साथ उपस्थित है। हिंदी सीरियलों के वर्त्तमान कथानक,अनसेंसर्ड वेब सीरीज और स्मार्टफोन की उन्मुक्तता इन जीवन स्थितियों के लिए आग में घी का काम कर रहे हैं।
'आधे अधूरे'एक ऐसे परिवार की कहानी है जिसके सारे सदस्य अपने जीवन की वर्तमान स्थितियों से असंतुष्ट हैं और उससे न निकल पाने की कुंठा से अभिशप्त हैं।पति महेंद्रनाथ बिजनेस में घाटा होने की वजह से बेकार होकर घर बैठ गया है।पत्नी की कमाई से ही घर चल रहा है, इसलिए पति और बच्चे मन मारकर उसकी मनमानी सहने के लिए विवश हैं।पत्नी कई पुरुषों के साथ घर छोड़कर जाने की योजना बनाती है,मगर परिस्थितियां ऐसी बनती हैं कि वह घर छोड़कर नहीं जा पाती।पत्नी का एक प्रेमी उसकी बड़ी बेटी को भगा ले जाता है।इस कारण छोटी बेटी को घर से बाहर तरह-तरह के ताने सुनने पड़ते हैं,जिससे वह बहुत चिड़चिड़ी रहने लगी है।वह अपनी सहेलियों से स्त्री-पुरुष संबंधों की चर्चा करते हुए करते हुए यौन संबंधों में दिलचस्पी लेने लगती है,जबकि इस लिहाज से वह अभी नाबालिग है। बड़े भाई की डांट से वह बिल्कुल नहीं डरती और घर में उससे मार पीट करती रहती है।मां चाहती है कि बेटा अशोक उसके प्रभावशाली संपर्कों की वजह से किसी अच्छी जगह नौकरी करने लगे किंतु बेटा ऐसे लोगों के घर आने पर अपने आप को बहुत छोटा और दयनीय समझने लगता है। पिता की लाचारी से वह कुंठित है और मां की मनमानी का हमेशा प्रतिरोध करता है।पति-पत्नी के बीच तल्ख लहजे में बहस चलती रहती है। मोहन राकेश के सधे हुए संवाद और धारदार भाषा का जादू दर्शकों पर तारी हो जाता है। पति महेंद्रनाथ समेत तीन अन्य प्रेमियों की भूमिका को विजय कुमार ने सहजता से अंजाम दिया है। हिंदी भाषा पर अच्छी पकड़ और अपनी पाटदार आवाज से वे प्रभावित करते हैं।पत्नी सावित्री की भूमिका में गीता त्यागी ने अपनी विशिष्ट छाप छोड़ी है। लंबे-लंबे संवादों की सहज प्रस्तुति और असंतुष्ट जीवन स्थितियों से निकले द्वंद्व और उहापोह को उन्होंने अपने अभिनय से साकार किया है।बड़ी बेटी की भूमिका में जेबा अंजुम छोटी बेटी की भूमिका में वाणी शर्मा और बेटे की भूमिका में आशुतोष खरे ने भी अपनी भूमिकाओं के साथ न्याय किया है।किसी भी कथा कहानी में एक छुपा हुआ संदेश होता है जिसे पाठक या दर्शक थोड़े चिंतन मनन के बाद ढूंढ निकालता है। 'आधे अधूरे'का संदेश साफ है।आधे अधूरे जीवन को यदि हम अनैतिक रास्ते से पूर्णता में बदलना चाहेंगे तो परिवार का विघटन तय है।इस अंधी दौड़ में शामिल होकर सामाजिक बहिष्कार,मानसिक यंत्रणा और अपनी संतति से उपेक्षा के सिवा कुछ हासिल होने वाला नहीं।
- रासबिहारी पाण्डेय