-रासबिहारी पाण्डेय
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एक आयोजन में प्रेम विषय पर बोलते हुए कथाकार जगदंबा प्रसाद दीक्षित ने कहा कि कुदरत ने सेक्स बनाया है,प्रेम का ईजाद तो हमने किया है ।जहां वर्जनाएँ हैं वहीं प्रेम है, अगर कोई वर्जना न हो तो प्रेम बहुत लंबे समय तक टिकने वाली चीज नहीं है।मुझसे ज्यादा प्रेम के बारे में कौन जानेगा जिसे प्रेम मिला ही नहीं ….दरअसल जिस औरत से उन्होंने दूसरी शादी की(अपनी पहली) वैचारिक मतभेद के कारण 50 की उम्र के बाद से ही उससे अलग रहने लग गए थे।बच्चे उनसे जुड़े रहे यह और बात थी।शायद इसीलिए प्रेम उनके लिए एक तिक्त अनुभव बनकर रह गया था।
मार्च २०१२में मैंने अनुष्का का उन पर केंद्रित एक विशेषांक प्रकाशित किया।उसके लोकार्पण समारोह में इतिहास दृष्टि से संपन्न एक लंबी बहस हुई जिसमें विजय कुमार,सुधा अरोड़ा,रमेश राजहंस,शैलेश सिंह,हृदयेश मयंक , सत्यदेव त्रिपाठी,आलोक भट्टाचार्य सहित अनेक कवि लेखकों ने शिरकत की ।वह यादगार आयोजन हमारे स्मृति के कोषागार में सदा सुरक्षित रहेगा। फिल्म निर्देशक महेश भट्ट ने उनके बारे में बातचीत करते हुए मुझसे कहा था कि
यू़ जी कृष्णमूर्ति जिन्हें मैं अपना गुरू मानता हूँ,जो मेरी रगों में बहते खून और सीने में जलती आग की तरह हैं ,उन पर लिखे मेरे अनुभव पुस्तक को हिंदी में अनुवाद करके सर ने मेरे ऊपर जो एहसान किया है,उसका कर्ज मैं कभी नहीं उतार पाऊँगा।मेरा सारा सिनेमा एक तरफ और ये तीन किताबें एक तरफ। सर ने मेरी काफी सारी जहालत को दूर किया है।महेश भट्ट सेंट जेवियर्स कॉलेज में दीक्षित जी के छात्र रह चुके थे।उनके लिए उन्होंने जिस्म,सर,नाजायज,नाराज,कलियुग,गैंगस्टर ,जहर जैसी कुछ यादगार फिल्में भी लिखीं थीं।सर के लिए उन्हें बेस्ट डॉयलाग राइटर का एवार्ड भी मिला था जो उनके घर में कभी यहाँ तो कभी वहाँ पड़ा हुआ मिलता था।
सर में नसीरुद्दीन शाह का एक संवाद है- हजारों पीर और पैगंबर इस दुनिया में आये,मगर यह दुनिया वैसी की वैसी है, न बदली है न बदलेगी …. इसे सुनकर लगता है दीक्षित जी खुद ही अपने जीवन का फलसफा बता रहे हैं।जीवन से उनको बड़ा गहरा प्रेम था।मृत्यु से आठ दस वर्ष पूर्व से ही वे बहुत अस्वस्थ रहने लगे थे।एक पाँव में सूजन के कारण चलने में उन्हें तकलीफ होती थी ,बदन में बेतहाशा दर्द रहा करता था ,लेकिन तमाम तकलीफों के बावजूद वे जीना चाहते थे ।एक बार मैंने उनसे पूछा की संधि सुधा (जिसका विज्ञापन टीवी पर आता है)से जोड़ों का दर्द से ठीक हो जाता है,आप यह दवा क्यों नहीं लेते? वे बोले मैंने दवा ली थी और मुझे इसका फायदा भी हुआ था लेकिन मेरे डॉक्टर ने कहा कि आप इसे मत लीजिए क्योंकि जिन चीजों से यह बनती है वे चीजें किडनी को नुकसान पहुंचाती हैं ,
इसीलिए मैंने लेना छोड़ दिया ।पता नहीं डॉक्टर की बात में कितनी सच्चाई थी ,लेकिन इस वाकये से दीक्षित जी के जीवन के प्रति मोह का पता चलता है।
मैंने एक बार मजाक मजाक में उनसे कहा - आपको देखकर लगता है जैसे कोई पुरानी इमारत खड़ी है।वे बोले - हाँ कभी भी गिर सकती है ।वे जर्मनी में अपने बेटे के पास इलाज के लिए गए थे लेकिन वापस नहीं आये।मेरे द्वारा लिया गया उनका आखिरी साक्षात्कार 'नया ज्ञानोदय’ के अप्रैल २०१५ अंक में प्रकाशित हुआ था।दीक्षित जी को जीते जी हिंदी साहित्य का न तो कोई बड़ा पुरस्कार मिला ,न ही उनकी रचनाओं पर शोध प्रबंध लिखा गया,इसे विडंबना ही कहा जाएगा।
दीक्षित जी के कहानी संग्रह शुरुआत की भूमिका में सर्वेश्वर दयाल सक्सेना लिखते हैं कि जिन लोगों को प्रेमचंद्र और रेणु की कहानियां पसंद आती हैं ,उन्हें ये कहानियां और पसंद आएंगी क्योंकि ये उस धारा को आगे बढ़ाने के साथ उसमें और अधिक जोड़ती हैं और उससे आगे जाती हैं ।यहाँ वे एक और बड़ी बात लिखते हैं कि मैं यह कहने का लोभ संवरण नहीं कर पा रहा हूं कि गंदगी और जिंदगी जैसी कहानी हिंदी कथा साहित्य में नहीं है और यह हिंदी कथा साहित्य की एक बहुत बड़ी उपलब्धि है।
चंद्रधर शर्मा गुलेरी अपनी सिर्फ एक कहानी ‘उसने कहा था’ की वजह से जाने जाते हैं (लिखी भी मात्र तीन कहानियां ),भुवनेश्वर सिर्फ एक कहानी भेड़िए की वजह से जाने जाते हैं ।अगर मैं यह कहूं कि दीक्षित जी का नाम भी हिंदी कथा में ‘गंदगी और जिंदगी‘जैसी कहानी के जरिए अमर रहेगा तो यह अतिशयोक्ति नहीं होगी। वैसेे उनका उपन्यास मुर्दाघर तो एक किवदंति बन ही चुका है ।हिंदी के वरिष्ठ कवि /आलोचक विजय कुमार की सर्वश्रेष्ठ पसंद दीक्षित जी की एक दूसरी कहानी मोहब्बत है।वे कहते हैं कि मुझे अगर हिंदी की पाँच सर्वश्रेष्ठ कहानियों का नाम लेना हो तो उसमें एक कहानी मोहब्बत जरूर होगी।
जिस दौर में हिंदी में नई कहानी और समांतर कहानी जैसे आंदोलन चल रहे थे, उन्हीं दिनों दीक्षित जी ने शुरुआत ,गंदगी और जिंदगी, दूसरा एहसास ,मोहब्बत जैसी मर्मस्पर्शी और यादगार कहानियां भी लिखी थीं, मगर आलोचकों ने इस ओर ध्यान नहीं दिया।इससे जाहिर है कि हिंदी का बहुत सारा आलोचना कर्म प्रायोजित होता है ।विश्व के महान रचनाकार टॉलस्टॉय ,दॉस्तोयवस्की,चेखव, हार्डी,इक्सले,जॉर्ज ऑखेल आदि को नोबेल पुरस्कार नहीं मिला लेकिन उनकी लोकप्रियता या पठनीयता पर इससे कोई फर्क नहीं पड़ा ।बहुतेरे लेखक ऐसे भी हैं जो नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हैं ,किंतु साहित्य से सरोकार रखने वाला एक बड़ा वर्ग उनकी कृतियों से अपरिचित है।
लेखन की दो प्रेरणाएं होती हैं ।पहली हमारी पीड़ा, जो अभिव्यक्ति मांगती है ।यह कई बार क्रोध को भी जन्म देती है। क्रोध भी अभिव्यक्ति मांगता है ।क्रोध के साथ ही हम एक दृष्टिकोण विकसित करते हैं ।दुख के कारणों का विश्लेषण करते हैं ।यह सारी यात्रा एक तकलीफ से शुरू होती है, खुद की भी ,दूसरों की भी। फिर हम जो रचते हैं ,हमारे जीवन दर्शन के रूप में सबके सामने आता है।
लेखन की दूसरी प्रेरणा लोकैषणा या वित्तैषणा के रूप में होती है ।हम कीर्ति,यश पाने के लिए लिखते हैं ।यश के साथ धन, पद आदि के लिए ...….इन दो प्रकार की प्रेरणाओं में किसकी प्रेरणा कौन सी है ….पहली है तो लेखन में व्यक्त होगी ,दूसरी को भी हम छिपा नहीं सकते ।जो लोग अधिकांश समय गुटबाजी को देते हैं ,यश कीर्ति पाने के साधनों में लगे रहते हैं ,उनकी रचनाओं का कोई स्थायी महत्व नहीं बन पाता ।इसके विपरीत जो यश ,पद प्राप्ति ,आदि के पीछे न भागकर नि:स्वार्थ साहित्य की साधना करते हैं ,जिनकी रचनाएं स्थायी मानव मूल्यों, दुख ,तकलीफ ,आक्रोश ,क्रोध ,संघर्षवृत्ति आदि को स्वर देती हैं,साहित्य की दुनिया में उनका स्थायी महत्व होता है।जगदंबा प्रसाद दीक्षित का शुमार भी उन लोगों में है जिन्होंने अपने लेखन को ही अपना पुरस्कार माना ।अभिव्यक्ति को स्वर देकर ही संतुष्ट हो लिए। जीवन के तमाम संत्रास ,घुटन, अजनबीपन आदि को लेकर अभिव्यक्ति की जो आकांक्षा थी ,उसे व्यक्त करने में ही अपनी सार्थकता समझी।
साहित्यकार अपने लेखन के बल पर बड़ा होता है या आत्म मुग्ध प्रचार पिपासु इतर गतिविधियों के बल पर ….वह भव्य पुस्तक लोकार्पण समारोह, ल कदक समीक्षा गोष्ठियां प्रायोजित -आयोजित भेंट वार्ताएं ,स्वयं खर्ची तथाकथित साहित्यक यात्राएं ,समारोहों के अध्यक्ष ,प्रमुख अतिथि बनने की भेडचाल में शामिल हो …..कलम चलाये जनसंपर्क प्रचार अभियान में रमे,अपनी प्रतिभा का उपयोग टूर आयोजकों को पटाने समीक्षकों को रिझाने ,सभा संस्थाओं को लुभाने ,प्रकाशकों को फंसाने में खर्च करे या समाजोपयोगी चिंतन मनन सृजन में ?70- 80 की उम्र में चर्चित होने के लिए ब्लॉग फेसबुक वेबसाइट की तकनीकें सीखे और विभिन्न बनावटी मुद्राओं वाली अपनी फोटोएं पोस्ट करे या उतने समय घर बैठे किसी दूसरी भाषा के श्रेष्ठ साहित्य का अध्ययन करके अपनी जानकारी ज्ञान और रचनात्मकता की धार तेज करे या कुछ नया सृजन करे?
साहित्य में किसकी क्या जगह होनी चाहिए ,यह कई सदियां मिलकर तय करती हैं ।रचनाकार के जीवन काल में उसे यहां कितना स्थान मिलता है, यह रचना का कोई पैमाना नहीं हो सकता ।हिंदी साहित्य का इतिहास लिखते समय आचार्य रामचंद्र शुक्ल ने सुमित्रानंदन पंत पर साढे 10 पेज लिखा और निराला पर सिर्फ ढाई पेज ,मगर बताने की जरूरत नहीं है कि आज पंत अधिक प्रासंगिक हैं कि निराला ।नामवर सिंह ने कितने ही लेखकों को उछालने की कोशिश की मगर जिनमें अपनी रचनात्मक ऊर्जा थी ,वही टिक पाए, बाकियों की कलई खुलने में देर नहीं लगी ।अगर रचना में दम है तो वह अपने पाठक और समीक्षक स्वयं पैदा कर लेगी ।कबीर की तरह जनता तक पहुंचने में भले ही उसे 500 बरस लग जाए, रचना मरेगी नहीं ।
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