Monday, 3 May 2021
देख लो आज हमको जी भर के, कोई आता नहीं है फिर मर के.
#Sagar sarhadi
देख लो आज हमको जी भर के, कोई आता नहीं है फिर मर के..
सागर सरहदी की फिल्म बाजार का यह गीत ऑल टाइम हिट है। आमतौर पर लोग अपने इश्क को छुपाते फिरते हैं,जाहिर नहीं होने देते, लेकिन सागर सरहदी ने अपने हर इंटरव्यू में इस बात पर चर्चा की और कहा कि अक्सर मेरे दोस्त मुझसे रश्क करते हैं कि मैंने बीस लड़कियों से कैसे इश्क कर लिया.. मगर सिक्के का जो दूसरा पहलू है उस पर किसी की नजर नहीं जाती कि बीस लड़कियों से जुदा होने का गम भी मेरे सीने में पैबस्त है।
एक बार मजाक मजाक में मैंने उनसे पूछ लिया कि आखिर इतने ब्रेकअप हुए क्यों....तो वे बोले - मैं शादी करने की स्थिति में कभी रहा नहीं, मगर हर लड़की घर बसाना चाहती थी, लिहाजा कुछ दिन साथ रहकर अलग होना मेरा नसीब बन गया था।एक बार एक लड़की ने बहुत इमोसनल होकर कहा- मैं चली जाऊंगी तो तुम कैसे रहोगे...मैंने कहा- तुम्हारी याद में रोऊंगा,अफसाने लिखूंगा,भूलने की कोशिश करूंगा,शायद तुम्हारे बाद किसी और का दामन मुझे मिल जाय... उसने कहा- शादी क्यों नहीं करना चाहते...मैंने साफ साफ बता दिया कि देखो मेरी आमदनी का कुछ ठिकाना नहीं होता,मैं खुद तो तकलीफ झेल लूंगा, मगर शादी के बाद बच्चों को तकलीफ में कैसे देख पाऊंगा...बच्चों को अच्छी तालीम देने,उनके सुख सुविधाओं के इंतजाम के लिए मैं क्लर्क बनके कोई और काम तो कर नहीं सकता....राइटिंग के अलावा मैं कुछ जानता भी नहीं।
सागर साहब उर्दू के ड्रामे लिखकर थिएटर करते हुए बहुत खुश थे,यह उनके मन का काम था,इससे उन्हें दिली खुशी मिलती थी,मगर ज़िंदगी में गुजर बशर करने के लिए यह नाकाफी था...ऐसे में उनका एक प्ले देखकर जब यश चोपड़ा ने उन्हें ‘कभी कभी’लिखने का ऑफर दिया तो वे ठुकरा नहीं सके।इस काम को उन्होंने एक चुनौती की तरह लिया और फिल्म लिखने से पहले इस क्राफ्ट को समझने के लिए दुनिया भर की बेहतरीन फिल्में देखीं।उनको यह पता था कि ढ़ेर सारे लेखक फिल्में फ्लॉप होने की वजह से इस इंडस्ट्री से आउट हो जाते हैं।इसलिए फ्लॉप राइटर का दाग उनके माथे पर न लगने पाए,इसके लिए उन्होंने भरपूर मेहनत की।यही वजह है कि उनकी लिखी फिल्में न सिर्फ कमर्शियल रूप से सफल हुईं बल्कि फिल्म क्रिटिक्स ने भी उनकी खूब तारीफ की।
....मगर उनका यह सफर आसान न था,वे कहते हैं कि ‘कभी कभी’ का पहला शो देखने के बाद इसके फाइनेंसर ने कहा कि फिल्म बहुत वाहियात बनी है,डायलॉग बुकिश हैं।इसको डब्बे में डालते हैं,दूसरी फिल्म शुरू करते हैं,मगर यश चोपड़ा को अपने काम पर भरोसा था,उन्होंने मान मनौवल करके किसी तरह फिल्म को रिलीज करवाया,शुरू में फिल्म को ठंढ़ी ओपनिंग मिली,मगर माउथ पब्लिसिटी ऐसी हुई कि अगले हफ्ते से लोग सिनेमा घरों तक अपने आप खिंचे चले आए।तब आज की तरह फिल्में एक हफ्ते की मेहमान नहीं हुआ करती थीं।हिट फिल्में तीन चार महीने तक सिनेमा घरों से उतरती नहीं थीं।यश चोपड़ा के लिए उन्होने चार फिल्में लिखीं- कभी कभी,सिलसिला,चांदनी और फासले।शाहरुख खान और रितिक रोशन जिस पहली फिल्म के रिलीज के तुरत बाद (दीवाना और कहो न प्यार है)सुपर स्टार बन गए, उससे भी सागर सरहदी का नाम संवाद लेखक के रूप में जुड़ा रहा।
उन्हें सबसे ज्यादे चर्चा मिली उनकी अपनी बनाई फिल्म बाजार के लिए,फिल्म के गीत और संवाद लोग आज भी याद करते हैं।इस फिल्म को उन्होंने दोस्तों से उधार लेकर बनाया था।शशि कपूर से प्रोडक्शन के इक्विपमेंट लिए,यश चोपड़ा के क्रेडिट पर रॉ स्टाक लिया और थिएटर से जुड़े होने की वजह से एक्टरों को कन्विंस करके काम करने के लिए राजी कर लिया इस वादे के साथ कि फिल्म के पैसे आते ही उन्हें दे दिए जाएंगे। नसीरुद्दीन शाह को पचीस हजार, स्मिता पाटिल को ग्यारह हजार और फारुक शेख, सुप्रिया पाठक को दस दस हजार।वे कहते थे कि इस फिल्म ने उन्हें जीवन भर पैसे दिए।आज तक कुछ न कुछ मिलता रहता है।दूरदर्शन ने तीन बार दिखाने के साढ़े सात लाख दिए।म्यूजिक के पैसे अलग मिले।थिएटर और सेटेलाइट के अलग मिले।ज्ञातव्य है कि फिल्म के राइट्स तयशुदा वक्त के बाद पुनःप्रोड्यूसर के पास चले आते हैं,वह फिर से उसका एग्रीमेंट करता है,इसलिए जिन लोगों ने कामयाब फिल्में बनाईं,उन्होंने पूरी जिंदगी ठाट से बिताई,उनके बेटे बेटियों को भी उसका लाभ मिलता रहा।
बीस साल पहले उन्होंने रामजन्म पाठक की कहानी बंदूक पर चौसर नाम से एक फिल्म बनाई जिसमें नवाजुद्दीन सिद्दीकी को पहली बार एक बड़ा रोल दिया था,मगर वह फिल्म आज तक डब्बे में पड़ी है।नवाज को अभिनेता के रूप में एक बड़ा मुकाम मिल चुका है,फिल्म की संपूर्ण लागत से चार गुना अधिक आजकल वे खुद अपना पारिश्रमिक लेते हैं।फिल्म जिसने भी देखी,सबने तारीफ की,मगर वह रिलीज क्यों नहीं हो पाई,यह भी एक रहस्य ही है।कुछ लोग दबी जबान से यह भी कहते हैं कि सेल एग्रीमेंट में रमेश तलवार की दखलंदाजी के कारण वह लटकी पड़ी है।स्मिता पाटिल को लेकर उन्होंने एक फिल्म ‘तेरे शहर में’बनाई थी,निर्माता से उनका झगड़ा कोर्ट तक गया और हरजाने के तौर पर पैसे देने के लिए उनको अपना एक फ्लैट बेचना पड़ा।वह फिल्म भी कभी बाहर नहीं आ सकी।बाजार भी बनने के बाद बहुत दिनों के बाद बिकी थी।रिलीज होने के बाद ‘गर्म हवा’जैसी फिल्म बनाने वाले एम एस सत्थू को यह फिल्म पसंद नहीं आई थी,मगर दुनिया भर में इसकी सफलता ने आलोचकों का मुंह बंद कर दिया था।
सागर साहब को साहित्यिक लेखक के रूप में अपनी पहचान न बना पाने की ख़लिश जीवन भर सालती रही।वे कहते थे कि मैं सिनेमा की दुनिया में इस तरह उलझा कि अपने लिए कुछ नहीं कर सका।मेरी दस अच्छी किताबें आतीं तो अदब में मेरा एक मुकाम बनता। सिनेमा का लेखन सामूहिक पसंद का काम है,वहां काम करते हुए कई लोगों की पसंद नापसंद का खयाल रखना पड़ता है।यहां तक भी ठीक है,मगर यहां रिपीटेसन बहुत है।बार बार एक ही तरह की बातें लिखनी पड़ती हैं।मैं थिएटर से गया था,मुझमें हर बार कुछ अलग, कुछ नया करने की चाहत थी जो वहां संभव नहीं हो पाया।यश चोपड़ा की सारी फिल्में देख लीजिए,सबकी कहानियां एक जैसी हैं।‘कभी कभी’ लिखते वक्त उन्होंने कहा- राखी की आंखों के लिए कुछ लिखिए।उसमें अमिताभ कहते हैं- आपकी आंखें जहां देखती हैं,एक रिश्ता कायम कर लेती हैं। फिर उन्होंने सलमा आगा की आंखों पर लिखने को कहा। मैंने देखा- सलमा की आंखें नीली हैं।मैंने उसके लिए लिखा - तुम्हारी आंखों से आसमान झांकता है।फिर मैंने सोचा- यार तीसरी बार फिर वे कहेंगे किसी हिरोइन की आंखों के लिए.....तो उसके लिए क्या लिखूंगा...पहले से सोचकर रखना होगा।
अगर वे निर्माता निर्देशकों की हां में हां मिलाते हुए काम कर रहे होते और बगैर किसी आनाकानी के साथ साथ लगे रहते तो बहुत अमीर शख्स होते मगर मन को मारकर ऐसे लोगों के साथ उठने बैठने की बजाय उन्होंने बसों और लोकल में सफर करते हुए किताबें पढ़ने और यार दोस्तों के साथ शामें गुजारना ज्यादा बेहतर समझा। वे कहते थे कि अधिकांश लोग मशहूर होने के बाद सोसायटी से अपने आपको काट लेते हैं।अकेले जीते हुए डिप्रेसन में चले जाते हैं,मगर मिलना जुलना गवारा नहीं करते।मैंने अपने आपको कभी इस खोल में नहीं रखा।अपना काम जब भी किया,पूरे मन से किया।आधे अधूरे मन से कोई काम नहीं किया।
एक बार उन्होंने राजेश खन्ना के किसी सेट का एक किस्सा बयान किया।कहने लगे कि राजेश खन्ना ने मुझसे पूछा कि आजकल मेरी फिल्में क्यों नहीं चलती हैं?मैंने कहा- मैं अपना ऑब्जर्वेसन बताऊंगा तो बुरा तो नहीं मानेंगे...बोले –नहीं,आप बेफिकर होकर कहिए। मैंने कहा- आप शूटिंग पर देर से आते हैं,आते ही यह बोल भी देते हैं कि मुझे जल्दी निकलना है तो प्रोड्यूसर डायरेक्टर को बोलता है कि सीन जल्दी निपटाइए,डायरेक्टर अगर राइटर हुआ तो उससे बोलता है या फिर खुद सीन छोटा करता है,जो कुछ ट्रीटमेंट सोच कर रखे होता है,उन सबको दरकिनार करता है,किसी तरह आपके डायलॉग शूट करता है और आपको फ्री कर देता है...यह सब करने में सीन की रूह निकल जाती है।हड़बड़ी में किया गया काम पब्लिक के दिल में कैसे उतरेगा...काका ने गौर से यह सब सुना और कहा- हो सकता है आपकी बात सही हो,मगर मुझे आज भी जल्दी निकलना है।
चंद्रगुत इस्टेट अंधेरी में उनका ऑफिस तमाम संघर्षरत कलाकारों का अड्डा था,वहां उनसे मिलने कोई भी किसी भी समय जा सकता था।दोपहर एक बजे से शाम के छह बजे तक वे प्रतिदिन वहां मुक्त भाव से सबके लिए उपलब्ध होते थे।चाय बनाने की एक इलेक्ट्रिक केतली,बिस्किट और खाखरे के पैकेट उनके आलमारी के दराज में रखे होते थे।कई कई बार चाय बनती थी और हंसी ठहाकों से वह कमरा गूंजता रहता था।कभी कभी उस कमरे में बीसियों लोग होते थे,कभी कभी वे वहां अकेले बैठे हुए मिलते थे।मुझे उनसे इन तनहाई के पलों में अनेक बार ढ़ेर सारी बातें करने का अवसर मिला है।उनके समकालीन साहिर,कृष्न चंदर,मोहिंदरनाथ,गुलजार आदि ढ़ेर सारे अदीबों के किस्से ....जो लिख दिए जायं तो शायद हंगामा खड़ा हो जाय।अधूरे प्यार की कसक उनके मन में सदा रही।वे औरत को दुनिया की सबसे नायाब चीज मानते थे। कहते थे कि अगर आप किसी के इश्क में हैं तो दुनिया आपके लिए सबसे खूबसूरत जगह है।इश्क न सही,अगर किसी लड़की से आपकी दोस्ती है तो भी आप बहुत खुशनसीब हैं।
-रासबिहारी पाण्डेय
Subscribe to:
Post Comments (Atom)
How to download and install Spades for PC - Dr.MD
ReplyDeleteThere are also 상주 출장샵 plenty 강릉 출장샵 of 강원도 출장마사지 options to 충주 출장샵 choose from. Spades is a traditional trick taking card game. There are 52 cards, four 하남 출장마사지 suits, and 3